क्या मैथिलीशरण गुप्त का सही मूल्यांकन नही हुआ?

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विमल कुमार

रज़ा फाउंडेशन ने गत दिनों जैनेंद्र, नागार्जुन, कृष्णा सोबती और रघुवीर सहाय की जीवनियां प्रकाशित की। इस कड़ी में रजनी गुप्त द्वारा लिखी राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जीवनी ‘कि याद जो करें सभी’ हाल ही में आई है। इन दिनों लखनऊ में एक बैंक मे कार्यरत रजनी जी की कहानियों और उपन्यासों से पाठक परिचित हैं। अब उनकी इस जीवनी ने लोगों का ध्यान खींचा है। वरिष्ठ कवि पत्रकार विमल कुमार ने इस जीवनी को पढ़ते हुए हिन्दी साहित्य में कुछ सवाल उठाएं है। क्या मैथिलीशरण गुप्त को एक नई दृष्टि से पढ़ने या मूल्यांकन करने की जरूरत है या मैथिलीशरण गुप्त की काव्य चेतना ही उनकी रचना की सीमा है?


“वे राष्ट्र के कवि हैं। जैसे मैं राष्ट्र के बनाने से महात्मा बन गया हूं पर मैथिलीशरण जी स्वयं इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि महाकवि बहुत बड़ा होता है। महाकवि का सम्मान इतना सस्ता नहीं होता। बगल में तुलसी घाट है। वहां एक महाकवि रहते थे। जब वे जीवित है उनकी जयंती नहीं मनाई गई। केवल साधुओं ने उन्हें पहचाना। धीरे-धीरे उनकी महत्ता ने देश का कल्याण किया। उत्सव और समारोह का मैं एक अर्थ समझता हूं कि लोग इकट्ठा होकर संकल्प करते हैं कि जो सेवाएं हुई हैं उनका गुणावनुवाद करना चाहिए और भविष्य में हम ऐसी सेवाएं करने का प्रयत्न करें। इस दृष्टि से मैथिलीशरण का अभिनंदिन हमारे राष्ट्रीय जीवन का शुभ लक्षण है। हमारी राष्ट्रभाषा का सम्मान है। यह व्यक्तिगत सम्मान का प्रश्न नहीं है। वे सही मायने में राष्ट्रकवि हैं।”

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 26 अक्टूबर 1936 को काशी में श्री मैथिलीशरण गुप्त की नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा आयोजित स्वर्ण जयंती समारोह में यह विचार व्यक्त किए थे। उस समारोह में निराला जी ने कहा था कि गुप्त जी प्राचीन होते हुए भी नवीन है। उस समारोह में जयशंकर प्रसाद,  ब्रजरत्न दास, राय कृष्णदास, रामचंद्र वर्मा, विष्णु पराड़कर, शांतिप्रिय द्विवेदी जैसे अनेक लेखक शामिल थे। इस अवसर पर गांधी जी ने गुप्त को मैथिली काव्य मान ग्रंथ भेंट किया था।

हिंदी साहित्य में इसके बाद जिस कवि के स्वर्ण जयंती समारोह का जिक्र मिलता है वे हैं निराला। 1948 में काशी में ही निराला की स्वर्ण जयंती मनाई गई थी। हिंदी साहित्य में किसी लेखक के पचास वर्ष पूरे होने पर केवल इन दोनों लेखकों की स्वर्ण जयंतियों का जिक्र मिलता है। इस से पता चलता है कि मैथिलीशरण गुप्त और निराला पचास वर्ष तक आते-आते कितने प्रतिष्ठित हो गए थे। वैसे, मैथिलीशरण गुप्त की लोकप्रियता पहले बहुत थी। महावीरप्रसाद द्विवेदी का सबसे अधिक वरदहस्त किसी कवि पर था तो मैथिलीशरण गुप्त पर ही था। हरिऔध और श्रीधर पाठक के बाद मैथिलीशरण की कीर्ति फैली थी। यह भी कहा जाता है ‘भारत भारती’ (1910) की प्रतियां तब ‘गोदान’ से अधिक बिकी थी। इस लिहाज से प्रेमचंद तब मैथिलीशरण गुप्त की तरह उतने लोकप्रिय नहीं थे। महत्मा गांधी जब भारत लौटे थे तब ‘भारत भारती’ की गूंज सब जगह मच रही थी। गांधी जी ने हिंदी के जिन दो- तीन लेखकों की किताबें पढ़ी थी उनमें एक मैथिलीशरण गुप्त ही थे। गांधी के सबसे अधिक निकट रामनरेश त्रिपाठी थे जो उनके साथ जेल में थे। गांधी जी के साथ हिंदी का कोई और लेखक जेल में नही रहा था। गांधी जी से जिन लेखकों की आत्मीय मुलाकातें हुई थी उनमें गणेशशंकर विद्यार्थी और माखनलाल चतुर्वेदी प्रमुख थे। प्रेमचंद की मुलाकात तो गांधी से नहीं हुई थी। निराला एक बार जरूर गांधी से तमतमाते हुए मिले थे जब गांधी ने यह बयान दिया कि टैगोर जैसा कोई कवि हिंदी में नही है। इन घटनाओं से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि गांधी जी की नजर में मैथिलीशरण गुप्त कितना महत्वपूर्ण थे और उन्होंने महाकवि की संज्ञा क्यों दी थी तथा वे उनके स्वर्ण जयंती समारोह में क्यों गए जबकि शुरू में उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त को जन्मदिन नही मनाने की सलाह दी थी।

रजनी गुप्त की उपरोक्त पुस्तक इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ हैं। रजा फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित यह किताब कितनी जीवनी है और कितना उपन्यास है, इसकी चर्चा हम बाद में करेंगे (रजा फाउंडेशन से अब तक जितनी जीवनियां आई हैं उनमें किसी को जीवनी परक उपन्यास नहीं बताया गया है) पर पहले इस जीवनी के बहाने मैथिलीशरण गुप्त के बारे में समय-समय पर लेखकों द्वारा की गई टिप्पणियों की चर्चा हम करेंगे जिससे पता चलता है कि मैथिलीशरण गुप्त के बारे में हिंदी जगत में एक खास तरह की राय या धारणा कैसी बनाई गई या बनी जिसके कारण वे धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल दिए गए या उनका पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हुआ या उनकी छवि एक हिंदू लेखक के रूप में बनी या   वे प्रगतिशील लेखकों द्वारा बनाई गई हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में शामिल नहीं रहे और अब तो उनकी छवि राष्ट्रवादी कवि के रूप में कैद होकर गई। आखिर इसके क्या कारण थे। क्या हिंदी आलोचना की संकीर्णता इसका कारण थी या राष्ट्रवाद के बारे में हमारी समझ यांत्रिक है या इसके लिए खुद मैथिली शरण गुप्त भी जिम्मेदार थे या उनकी रचनाओं में इसके तत्व विद्यमान थे।

इस समय देश का जो हाल है उसमें राष्ट्रवाद की चर्चा करना काफी संवेदनशील मामला हो गया है और राष्ट्रवादी कहना तो और भी खतरनाक हो गया है क्योंकि तथाकथित राष्ट्रवादियों ने इस शब्द पर एकाधार कर लिया  को है और उसका भ्रामक अर्थ पेश करना शुरू कर दिया है। असल में राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान जिन लेखकों ने राष्ट्रीय चेतना को अपनी रचनाओं में व्यक्त किया उसका मूल्यांकन नहीं हुआ। हिंदी जगत के मन में यह लगातार दुविधा  बनी रही कि इन राष्ट्रवादी लेखको का क्या किया जाए? उन्हें अपनी प्रगतिशील परंपरा में शामिल किया जाए या नहीं या उन्हें राष्ट्रवादी रचनाकार के रूप में श्रेणीबद्ध कर प्रगतिशील परंपरा से अलग कर दिया जाए किया जाए। भारतीय जनता पार्टी संघ परिवार से जुड़े लोग आज खुलकर कहने लगी है कि सारे राष्ट्रवादी लेखक उसके अपने हैं और वामपंथियों ने इन राष्ट्रवादी लेखकों ने उनकी उपेक्षा की है, उनका मूल्यांकन नहीं किया लेकिन यह भी सच है की इन राष्ट्रवादी लेखों के बारे में अब तक जिन लोगों ने जो थोड़ा बहुत लिखा है या अच्छी राय बनाई  वे सब के सब अधिकतर गैर दक्षिणपंथी लेखक ही हैं चाहे वह महादेवी वर्मा हो या हजारीप्रसाद दिवेदी या बाद के आलोचकों में नंदकिशोर नवल (जिन्होंने मैथिलीशरण गुप्त और दिनकर पर लिखा) या बिजेंद्र नारायण सिंह हों, भले ही रामविलास शर्मा, शिवदान सिंह चौहान या नामवर सिंह ने इन लेखकों को अधिक तरजीह नहीं दी।

रजनी गुप्त ने महादेवी की कुछ पंक्तियों को इस जीवनी में उद्धृत किया है जो बड़ा महत्वपूर्ण है। महादेवी ने उस टिप्पणी में कहा था— “हम हिंदी के लोग कितने कृघ्न हैं कि जो एक प्रकार से हिंदी कविता (खड़ी बोली) के जन्मदाता थे, जिनकी उंगली पकड़कर कविता ने चलना सिखा, उन्हीं को आज हम अस्वीकार कर रहे हैं। सुना है, अब हमारे यहां ऐसे महान आलोचक हो गए हैं जो दद्दा को कभी नहीं मानते हैं। इससे बड़े दुर्भाग्य की बात भला और क्या होगी है? रजनी को महादेवी वर्मा की इस टिप्पणी को कहां से उदित किया है इसका स्रोत नहीं बताया है और महादेव जी ने यह टिप्पणी किस संदर्भ में की है उसका भी जिक्र नहीं किया है लेकिन इस टिप्पणी से एक बात स्पष्ट होती है कि मैथिलीशरण गुप्त को उनके जीते जी ही कुछ लोग कभी नहीं मानने लगे थे जिसके कारण महादेव जी को यह कड़ा प्रतिवाद करना पड़ा। महादेवी जी निराला की तरह मैथिलीशरण गुप्त को भी राखी बांधती थी। गुप्त जी जब राज्यसभा की सदस्यता नहीं स्वीकार रहे थे तो पंडित नेहरू ने महादेवी जी से ही गुप्त जी को मनाने का अनुरोध किया था। इस से दोनों के आत्मीय सम्मानजनक संबंधों को जाना जा सकता है।

महादेवी ने वह टिप्पणी किस आलोचक को ध्यान में रख कर लिखी थी यह नहीं मालूम  पर 1937 में ही शिवदान सिंह चौहान ने ‘विशाल भारत’ में लिखा था— ‘भारत भारती’ ना साम्राज्य विरोधी है और न दलित श्रेणी की भावनाओं की रक्षक वह अगर कुछ है तो साम्राज्यवाद की पोषक और ब्रिटिश साम्राज्यवाद की चाटुकार है.। तब शिवदान जी  ऐसी तीखी आलोचनाएं लिखते थे। एक बार निराला के बारे में उन्होंने आलोचना की थी तो निराला ने उनकी उसकी समय बहुत खोजखबर ली थी और तीखे अंदाज में लगभग डांटते हुए कहा था कि केवल आप ही प्रगतिशील नहीं हैं। यह रजनी गुप्त की किताब से पता चलता है कि मैथिलीशरण गुप्त में मित्र गण भी उनकी पीठ पीछे आलोचना करने लगे थे। तभी राय कृष्णदास कहते हैं लोग आपके पीछे आपकी रचनाओं का परिहास भी करते हैं।लेकिन गुप्त जी इस से विचलित नहीं थे।

इस पुस्तक से पता चलता है—भारत भारती के अंत में वर्णित सोहनी के कारण तो झांसी की पुलिस और झांसी के कलेक्टर तक भड़क गए और ग्रुप जी को कारावास भिजवा दिया”।

रजनी ने इस किताब में मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य को लेकर हुई उनकी आलोचनाओं का जवाब देने का प्रयास किया है लेकिन हरिऔध ने 1926 में ही एक ऐसी टिप्पणी की थी जिसका जवाब रजनी ने नही दिया। हरिऔध का कहना था कि सियाराम शरण गुप्त की कविताएं मैथिलीशरण गुप्त से अधिक अच्छी हैं।

हिंदी जगत में यह आम धारणा है कि सियाराम शरण गुप्त बेहतर कवि थे लेकिन मैथिलीशरण की लोकप्रियता के कारण वह आजीवन ओझल रहे। बहरहाल,  रजनी जी इस किताब का मुख्य उद्देशय मैथिलीशरण गुप्त की रचनाओं को लेकर तत्कालीन आलोचना पर विचार करना और दोनों भाइयों के साहित्य की तुलना करना नहीं है लेकिन उनका मकसद गुप्त जी के जीवन-प्रसंगों और साहित्य को व्यापक अर्थों में व्यक्त करना है जिससे हिंदी का पाठक गुप्त जी को एक सही परिप्रेक्ष्य में देख सके और जान सके, खासकर आज की पीढ़ी जो गुप्त जी को बहुत कम जानती हैं।

इस पुस्तक में बताया है कि किस तरह गुप्त जी बालविवाह के शिकार हुए और उनकी शादी मात्र नौ साल की उम्र में  कर दी गई, उनकी दो पत्नियों का देहांत भी हो गया। उनकी कुल आठ संताने भी मौत के गाल में समा गईं। इस तरह से देखा जाए तो गुप्त जी के निजी जीवन में दुख का अथाह समंदर था। इसके साथ ही उनके परिवार में भी संपत्ति और बटवारे को लेकर भी काफी विवाद हुए जिससे उनका पूरा पारिवारिक जीवन बहुत परेशान रहा। इन सबके बीच रहकर गुप्त जी ने अपने व्यक्तित्व का विकास किया और देश तथा साहित्य को अपने अवदान से समृद्ध किया।

मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य को समझने के लिए डॉ नगेंद्र ने सही सूत्र दिया है। उन्होंने लिखा है—” वह कालिदास, रविंद्रनाथ और प्रसाद की परंपरा के कवि नहीं है। छायावाद के कवियों का रमणीय स्थल विधान उनमें खोजना व्यर्थ है। माइकल मधुसूदन दत्त, इकबाल और निराला के काव्य में उद्वेलित प्राणों की ऊर्जा भी यहां नहीं है। यह कवि तो बाल्मीकि, व्यास भवभूति और तुलसी की परंपरागत का है जो मानव जीवन की रागात्मक अभिव्यक्ति में ही कवि कर्म की सार्थकता मानता रहा है।”

रजनी गुप्त ने इस जीवनी में गुप्त जी को मानवतावादी रचनाकार बताया है लेकिन घर में स्त्रियों को लेकर उनके दोहरे मानदंड की आलोचना भी की है खासकर अपनी पुत्रवधु शांति के संबंध में उनके व्यवहार को लेकर।

रजनी की यह किताब पूरी तरह न तो जीवनी है और नहीं उपन्यास। उन्होंने दोनो विधाओं को मिलाकर यह कृति लिखने का प्रयास किया है पर इसमें वह सफल नही हो पाई हैं। उन्होंने किताब के अंत में संदर्भ ग्रंथ की एक सूची जरूर दी है पर अपने तथ्यों को कहां से उद्धृत किया इसे फुटनोट में नहीं बताया है। पाठक के मन में कई सवाल उठते हैं। यह पूरी तरह शोध ग्रंथ भी नहीं है पर पाठक को पहली बार मैथिलीशरण के बारे में एक समग्र जानकारी मिलती हैं। रजनी ने गुप्त जी की फली और तीसरी पत्नी दोनों का नाम जिया बताया है। इस पर उन्हें प्रकाश डालना चाहिए थी। मुंशी अजमेरी का वास्तविक नाम प्रेमकुमार ‘प्रेम’ बताया है फिर मुंशी अजमेरी को मुसलमान बताया है। इस तरह किताब में कई विसंगतियां हैं लेकिन फिर भी लेखिका ने मेहनत की है लेकिन इसका फलक बड़ा रखती तो वह पूरे युग को समेट लेती। उन्हें साधुवाद की उन्होंने एक महत्वपूर्ण कृति हिंदी को दी और हम अपने राष्ट्रकवि को अधिक जान पाए।


कि याद जो करें सभी [राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जीवनी] : रजनी गुप्त। वाणी प्रकाशन। प्रथम पेपरबैक संस्करण 2021, मू. 399


विमल कुमार : वरिष्ठ कवि पत्रकार। कविता कहानी उपन्यास व्यंग्य विधा में 12 किताबें। गत 36 साल से पत्रकार। 20 साल से संसद कवर। चोरपुराण पर देश के कई शहरों में नाटक। ‘जंगल मे फिर आग लगी है’ और ‘आधी रात का जश्न’ जैसे दो नए कविता-संग्रह में बदलते भारत मे प्रतिरोध की कविता के लिए चर्चा में। आप लेखक से इस ईमेल पते पर संपर्क कर सकते हैं— arvindchorpuran@yahoo.com


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