पत्रिकाओं में रेणु की उपस्थिति

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कुमार मंगलम

किसी भी रचनाकार के उत्तर जीवन में मूल्यांकन के कई पड़ाव आते रहते हैं किंतु जन्मशती वर्ष एक ऐसे अवसर के रूप में हमारे सामने होता है जहाँ  उस रचनाकार के अवदानों का सम्पूर्ण मूल्यांकन होता है और साथ ही हम एक कृतज्ञता स्मरण के भाव से भरे रहते हैं। आज ऐसा ही अवसर है। रेणु, फणीश्वर नाथ रेणु का जन्मशती है। संवदिया वाले रेणु, तीसरी कसम वाले रेणु, मैला आँचल वाले रेणु, परती परिकथा वाले रेणु, रसप्रिया वाले रेणु, शैलेन्द्र वाले रेणु, फेनूगिलासी बोली वाले रेणु, औराही हिंगना वाले रेणु, समाजवादी रेणु ना जाने कितने रेणु हैं। इन्हीं रेणु के समग्र मूल्यांकन की कोशिश इनके जन्मशताब्दी वर्ष में कुछ पत्रिकाएं कर रही हैं।

“बनास जन”

बनास जन विगत कुछ वर्षों में अपनी उत्कृष्टता से पाठकों का ध्यान खींचने में सफल रहा है। अपने विशेषांकों में बनास ने हिंदी के पाठकों के मन में एक बेहतर मुकाम हासिल किया है। बनास जन्मशती श्रृंखला में शताब्दी स्मरण के तहत भीष्म साहनी पर भी अंक केंद्रित कर चुका है। इस श्रृंखला में अब फणीश्वर नाथ रेणु अंक भी बेहद महत्वपूर्ण है। इस अंक में जीवन स्तम्भ में भारत यायावर द्वारा लिखित जीवनी का अंश और रामधारी सिंह दिवाकर एवं संजय जायसवाल के संस्मरण हैं, उपन्यासकार रेणु स्तम्भ में मैला आँचल पर सबसे अधिक एवं परती परिकथा, जुलूस, कितने चौराहे, दीर्घतपा, पल्टू बाबू रोड पर युवाओं से लेकर वरिष्ठों तक के आलेख शामिल है। कथाकार रेणु पर रविभूषण, जीवन सिंह जैसे समर्थ आलोचकों के आलेख हैं तो वहीं रसप्रिया, तीसरी कसम, लाल पान की बेगम पर अलग से आलेख भी है। कथेतर स्तम्भ में रेणु के रिपोर्तार्ज पर सिने प्रसंग में पंचलाइट पर और कवि रेणु पर आलेख के अलावा और अंत में रेणु को पढ़ते हुए में रेणु की पाठकीयता पर दो आलेख शामिल है। यह अंक की बानगी है। रेणु के इस जन्मशती में रेणु पर एकाग्र यह पत्रिका ‘मस्ट रीड’ है।

संवेद

संवेद का यह 123 वाँ अंक है। बनास की तरह ही यह अंक भी काफी समृद्ध है। इसका आकार भी व्यापक है और यह अंक भी रेणु का समग्र मूल्यांकन करने में मील का पत्थर है। यह एक व्यवस्थित अंक है जिसमें मधुरेश, अशोक वाजपेयी, शम्भुनाथ, मदन कश्यप से लेकर सोनी पाण्डेय, नीरज खरे, रामनरेश राम तक शामिल हैं। रेणु के समग्र अवदानों पर आलोचकीय दृष्टि से मूल्यांकन करने में यह अंक सफल हो सका है। इस अंक में किशन कालजयी की मेहनत और उनकी दूर दृष्टि साफ़ नजर आती है। लगभग 550 पन्नों में फैला यह अंक ना सिर्फ उनके रचनाओं पर केन्द्रित है बल्कि उन रचनाओं में निहित उसके वैचारिक बहसों और विमर्शों के साथ संवाद स्थापित करने वाली पत्रिका है।

कथादेश

कथादेश का फरवरी 2021 अंक रेणु जन्म-शती पर केन्द्रित है। यह अंक अपने आप में अलहदा है। इस अंक को पुनर्सृजन में रेणु कहा गया है। इस अंक के अतिथि संपादक राकेश बिहारी हैं। इस अंक में रेणु के मूल्यांकन को केंद्र में तो रखा ही गया है इसके साथ ही रेणु के रचनात्मक जमीन को एक विस्तार देने की कोशिश भी किया गया है। यह अंक लम्बे समय तक इसलिए भी याद किया जाएगा की रेणु की कहानियों की जमीन पर कुछ नयी कहानी विकसित करने किया गया है।यह अपने आप में एक रचनात्मक हस्तक्षेप है। पंकज मित्र, कविता, आशुतोष, राकेश दूबे और शिवेंद्र की कहानियां इस अंक को विशिष्ट बनाती हैं। आशीष त्रिपाठी, नीरज खरे, प्रमोद कुमार तिवारी, विनोद तिवारी के आलेख और राकेश बिहारी का सम्पादकीय पठनीय और मूल्यांकनपरक हैं। यह अंक अपने आकार में तनु किन्तु विशिष्ट है और अधिक सर्जनात्मक भी।

लमही

लमही का अक्टूबर-दिसम्बर 2020 अंक फणीश्वरनाथ रेणु पर केन्द्रित है। इस अंक में उपन्यास, संस्मरण, और कहानी पर मूल्यांकन के साथ संस्मरण और एकाग्र मूल्यांकन के आलेख मौजूद है। इस अंक में तीसरी कसम, रसप्रिया, लालपान की बेगम, एक आदिम रात्रि की महक, पहलवान की ढोलक, पंचलैट और संवदिया कहानी भी संकलित है जो शताब्दी वर्ष में पुनर्पाठ का मौका उपलब्ध कराती है। मूल्यांकन के साथ पाठ का सौन्दर्य इस अंक को विशिष्ट बनाता है। अवधेश प्रधान, अरुण होता, नीरज खरे का आलेख इस अंक की उपलब्धि है।

मुक्तांचल

मुक्तांचल पत्रिका का रेणु शतवर्ष विशेषांक के सम्पादक मृत्युंजय पाण्डेय हैं। इस पत्रिका में गोपेश्वर सिंह का संस्मरण और रेणु के उपन्यास, कहानी और कथेत्तर विधाओं पर मूल्यांकन परक आलेख हैं। मैनेजर पाण्डेय, भारत यायावर, पंकज मित्र, जितेन्द्र श्रीवास्तव, अनिल त्रिपाठी, नलिन रंजन सिंह, अरुण होता, सदन झा, हितेंद्र पटेल, विद्या सिन्हा, प्रेम कुमार मणि, नीरज खरे, रोहिणी अग्रवाल के आलेख बहुत महत्त्व के हैं। यह अंक परिधि पर घटित होता है और केन्द्रीयता को भंग कर रेणु का एक पारधीय मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।

आलोचना

आलोचना का अंक ६४, यूँ तो यह रेणु पर विशेषांक नहीं है पर शताब्दी स्मरण के बहाने रणेंद्र का एक महत्वपूर्ण आलेख ‘रेणु के कथागायन का सौन्दर्य और सीमाएं’ और रामनिहाल गुंजन का आलेख फणीश्वरनाथ रेणु : साहित्य-चिंतन, रचना-विवेक और कथा-दृष्टि’ इसमें मौजूद है। यह दोनों आलेख रेणु को देखने का एक विशिष्ट नजरिया देते हैं। विशेषांकों के इस श्रृंखला में छौंक की तरह इन आलेखों की उपस्थिति महत्वपूर्ण है। 

प्रयाग पथ

इलाहबाद से निकलने वाली पत्रिका प्रयाग पथ के रेणु विशेषांक के अतिथि सम्पादक कुमार वीरेन्द्र हैं। प्रयाग पथ का जनवरी 2021 अंक रेणु विशेषांक है। इस अंक में भी रेणु के समग्र रचनाओं पर विभिन्न अध्येताओं के मूल्यांकन परक आलेख शामिल हैं। इस अंक में कर्मेंदु शिशिर से आशुतोष कुमार सिंह की रेणु पर बातचीत उल्लेखनीय है।

माटी

माटी पत्रिका का अंक 16 रेणु विशेषांक है, इस अंक का सम्पादन वरिष्ठ कवि और साहित्य सेवी विमल कुमार ने किया है। 200 पृष्ठों में लगभग 50 से अधिक रचनाकारों ने इस अंक में रेणु को याद किया है। इस अंक की विशिष्टता नलिन विलोचन शर्मा एवं रामविलास शर्मा के आलेख हैं। अन्य सभी विशेषांकों की तुलना में यह अंक एक कदम आगे है, जहाँ परम्परा और आधुनिकता के वातायन से रेणु का मूल्यांकन सम्भव हुआ है।

रेणु के जन्मशती पर उनके अवदान पर केन्द्रित पत्रिकाओं के इस क्रम में पाखी, नवनीत, सृजन-सरोकार और सृजन-लोक ने भी अपने अंक को रेणु पर केन्द्रित किया है। सम्भवतः हिंदी में अपने पुरखे रचनाकार को इतनी विविधता से पहली बार ही याद किया जा रहा है। इतनी पत्रिकाओं का एक साथ विशेषांक आना सुखद और आश्चर्यजनक है। यह कृतज्ञता का भाव और आलोचना का विवेक हिंदी को समृद्ध करेगी। 

कुमार मंगलम : शोधार्थी, इग्नू। कविताएँ और आलोचना लिखते हैं। समकालीन हिंदी कविता में शहर और गांव की विविध अर्थछवियां विषय पर शोध कर रहे हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ तथा आलेख प्रकाशित। कुमार मंगलम से इस मोबाइल नंबर पर संपर्क किया जा सकता है— 8840649310


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