फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियों में स्त्री-परिचय : रोहिणी अग्रवाल

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प्रस्तुति : प्रज्ञा तिवारी

हिंदी समालोचना के क्षेत्र में एक बड़ा नाम है श्रीमति रोहिणी अग्रवाल जी का। प्रस्तुत है हिंदी के महान लेखक श्री फ़णीश्वरनाथ रेणु की कहानियों में स्त्री विमर्श पर रोहिणी अग्रवाल एवं प्रज्ञा तिवारी की बातचीत के कुछ विशेष अंश :

प्रज्ञा: अपनी कहानी तीसरी कसम में रेणु ने स्त्री के किस रूप को दर्शाया है?

रोहिणी: तीसरी कसम रेणु जी की सिग्नेचर कहानी कही जाती है। तीसरी कसम और रेणु दोनों एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। हालांकि यह कहानी हिरामन की कहानी है लेकिन अगर उसमें हीराबाई न होती तो हिरामन भी नहीं होता। यह हीराबाई के संघर्ष की और हिरामन के सपनों की कहानी है जिसे हम सिर्फ कहानी पढ़कर न्याय नहीं कर पाएँगे क्योंकि कहानी का जो एक पक्ष छूटा हुआ था– हीराबाई, उसे रेणु ने जैसे इस कहानी का दूसरा भाग लिखते हुए फिल्म के रूप में पूरा किया है। हीराबाई हमें ज़्यादा विज़िबल, ज़्यादा दृश्यमान होती हैं फिल्म में। मेरा मानना है कि मारे गए गुलफाम दो भाग में रची गई है – एक लिखित रूप में, एक दृश्य-श्रव्य रूप में, फिल्म की पटकथा के रूप में। यहाँ पूरी तरह से हमें फिल्म पर फोकस करना होगा। वहाँ पर कम्पनी की औरत, जिसे वहाँ लोग पतुरिया पट्टी की स्त्री कहते हैं,की पहचान यह होती है कि वह स्त्री कुलीन स्त्री नहीं है, वह घर-परिवार की स्त्री नहीं है जिसके साथ सुनिश्चित, सुपरिभाषित सम्बंध बनाए जा सकें। वह स्त्री परिवार की, समाज की चौहद्दियों से बाहर खड़ी कर दी गई है। एक स्त्री है जो पुरुषों के समाज में, पुरुषों को रिझाकर काम कर रही है तो निश्चित रूप से हमारा परिवार, हमारा समाज, हमारी परम्पराएँ और हमारी संस्कृति कुलीन स्त्री की तरह इस स्त्री का महिमामंडन बिल्कुल नहीं करती। उसे देह की तृप्ति के लिये एक औज़ार मानती है। वह वैश्या नहीं है लेकिन वह वैश्या के कोष्ठक में खड़ी कर दी गई स्त्री है जिसके लिये परिवार का सपना, विवाह का सपना देखना एक अक्षम्य अपराध की तरह होता है। जिसकी सेक्शुऐलिटी को अपनी मुट्ठी में करने को बहुत से लोग आते हैं। यह बात भी ख़ास तौर पर ध्यान में रखनी चाहिये कि मारे गये गुलफ़ाम कहानी में ज़मींदार का कैरेक्टर बिल्कुल भी नहीं है, वह फिल्म में है और फिल्म में उसका होना एक ख़लनायक के तौर पर होना है। वो जो प्रेम की एक हल्की-सी बहुत मासूम सुगबुगाहट हमें हिरामन और हीराबाई के बीच में हवा पर अदृश्य तैरती हुई दिखाई देती है जो झरने की तरह बह रही है, जो हमें गुदगुदा रही है, वह एक मद्धम-मद्धम, मीठी-मीठी आँच बनकर फिल्म में आ रही है और उस आँच को बेदर्दी से बुझाने की पूरी की पूरी भूमिका ज़मींदार विक्रम के ऊपर है। रेणु की एक बहुत बड़ी ख़ासियत है कि वो समाज की बात करते हैं लेकिन सामाजिक यथार्थ को पेनेट्रेट करने का दावा नहीं करते। उनके प्रेम की कहानी मोमेंट की कहानी होती है, उनके यहाँ पल बहुत महत्वपूर्ण है, ऐसा लगता है कि समाज बहुत बैकड्रॉप में चला गया है लेकिन इसके बावज़ूद वे समाज की कुत्सित व्यवस्थाओं को उद्घाटित करते हैं। इस कहानी में जब हीराबाई, हिरामन और विक्रम का त्रिकोण बना रहे हैं तब ऐसा लगता है कि वे पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चैलेंज कर रहे हैं। किस तरह से यौन शुचिता की अवधारणा आई है, किस तरह से एक घर की चौहद्दी से बाहर धकेलकर एक स्त्री को समाज में पेशा अपनाने के लिये बाध्य कर दिया गया है। हमारी पितृसत्ता जो एक आचार संहिता बना रही है, डू ऐंड डोंट्स का जो निर्माण कर रही है, वह बिल्कुल दृश्यमान होकर यहाँ हीराबाई की वेदना में दिखाई पड़ता है जब फिल्म में वो कहती है कि हम लैलाबाई का पार्ट तो कर सकती हैं पर ज़िंदगी में हम लैलाबाई नहीं बन सकतीं, हमें प्रेम का अभिनय करना सिखाया गया है लेकिन प्रेम हमारे लिये नहीं है। तो इस कहानी को मैं प्रेम के सपने की और प्रेम की प्रवंचना की कहानी कहती हूँ जो हमें पितृसत्तात्मक व्यवस्था को एक नए ऐंगल से, एक नये कोण से समझने की एक संवेदना देता है।

प्रज्ञा : रेणु ने तीसरी कसम में उस दौर के पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों के जीवनऔरकम्पनी की औरत के इम्प्रेशन को बड़े ही खुले तौर पर दिखाया है।

रोहिणी: जी बिल्कुल और देखिये, तीसरी कसम में दो तरह की कम्पनी की औरत की बात की गई है। पिछली बार हिरामन कम्पनी की जिस सवारी को लेकर जा रहा है, वह बाघ है और उस बाघ को ट्रेन करने वाली स्त्री की चर्चा वह बार-बार कर रहा है। साथ ही वह चाहता है कि वह हीराबाई को ज़माने की नज़र से बचाकर रखे, वहाँ पुरुष की पज़ेसिव शख़्सियत के बारे में भी बहुत मासूमियत से इशारा कर रहे हैं रेणु। वह पज़ेसिवनेस का भाव प्रेम के भाव के अंतरण के साथ जैसे-जैसे बढ़ता जाता है वो उसकी सुरक्षा करने की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर और भी ज़्यादा लेता है और कहता है कि तुम ये काम छोड़ दो, तुम सर्कस कर लो, वहाँ कोई कुछ नहीं कहेगा तुम्हें। अभी तो मेले में जब लोग नाच देखते हैं तो कितना हंगामा करते हैं, लोग कितना कहते हैं कि ये पतुरिया है, तुम्हारे बारे में अंट-शंट बोलते हैं। यहाँ स्त्री के सशक्तिकरण की बात उन व्यवसायों में है जो व्यवसाय पुरुष का रंजन नहीं करते। स्त्री सशक्त तब हुई है जब उसके हाथ में कमांड है, चाबुक है, वर्चस्व है। यह एक बहुत बड़ा प्वाइंट है सोचने के लिये कि पुरुष स्त्री को परतंत्र भी कर रहा है और सिर्फ उसी स्वतंत्र स्त्री को अंगीकार कर रहा है जो उस पर शासन करती है। प्रेम में कहीं न कहीं वल्नरेबल स्त्री का बिम्ब ही हमारे सामने प्रस्तुत है।

प्रज्ञा : लाल पान की बेग़म में जो मुख्य किरदार है बिरजू की माँ का, उस किरदार के उल्लास, उमंग, दुख को रेणु ने किस तरह से चित्रित किया है?

रोहिणी: ये कहानी एक कविता है। मुझे लगता है जब रेणु अपनी तूलिका उठाते हैं तोपेंटिंग करते हैं और ऐसी पेंटिंग जिसमें संगीत का नाद मिला हुआ है। उनकी बोलती हुई, गाती हुई पेंटिंग होती है और जब मैं ये कहानी पढ़ती हूँ तो मुझे लगता है कि बिरजू की माँ कौन है? अचानक याद आता है ठेस कहानी का नायक सिरचन। मुझे लगता है अगर सिरचन का स्त्री संस्करण तैयार किया जाए तो वह बिरजू की माँ बनेगी। पल में तोला पल में माशा। पल में अगिया बैताल, पल में अपना सबकुछ अर्पण कर देने वाली। असल में रेणु के यहाँ जैसा कि मैंने पहले भी बताया, एक मोमेंट, एक मनोवृत्ति, एक उच्छवास, एक भाव, एक तरंग ये चीज़ें महत्त्वपूर्ण हैं और इसके माध्यम से वो अपने नायक-नायिका, अपने पात्रों की मासूमियत, निश्छलता, निष्कपटता को एक मूल्य के रूप में अपनी रचनाओं में उकेरते हैं और जब एक निष्कपट, मासूम नायक-नायिका उनके यहाँ आती है तो उसके साथ बहुत-सी चीज़ें साथ-साथ आती हैं – राग, उल्लास, उत्साह, परोपकारिता का भाव, विश्वास आता है, एक कम्यूनिटी की फीलिंग आती है, और उसमें गालियाँ भी आती हैं, उसमें ईर्ष्या भी आती है, उसमें उलाहने, ताने, शिकवे भी आते हैं लेकिन क्योंकि वह एक पल के साथ बंधी हुई हैं, तो अगला पल बिल्कुल एक अलग चीज़ के साथ आएगा। यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है। लाल पान की बेगम कहानी में स्थायी है मनुष्यता, स्थायी है पारस्परिक विश्वास, स्थायी है सम्बंधों को आगे लेकर जाने की एक ज़िद, एक जिजीविषा, स्थायी है अपने समय का एक मोन्युमेंटबनने का बढ़ा-चढ़ा भाव तो इसीलिये वो पल में तोला पल में माशा हो रही है। हमें दिखता है कि कुछ भी स्थायी नहीं है इसीलिये देखिये वो बदमाश बिरजू, जिसे ना तो गुड़ मिला है ना शकरकंदी और जो चुहल करता हुआ जब मिलिट्री का टोप यानि कड़ाही सिर पर रखकर आता है कि इसपर डंडे मारो तो भी कुछ नहीं होता तो उसे किस तरह से चूहे की तरह बिल में दबा दिया जाता है उसकी उत्तेजित, क्रुद्ध माँ द्वारा। और जब वही बिरजू की माँ खुश होती है क्योंकि उसका पति बैलगाड़ी लेकर आ गया है और अब वो मेला जा सकती है तो किस तरह से बिरजू अपने बिल से बाहर आ रहा है और कह रहा है कि ब्लैक मार्टिन में मैंने पाँच शकरकंदी खाई थी। वह भी जानता है उसकी माँ का स्वभाव भुरभुरा है। किस तरह से जंगी की पतोहू एक खलनायिका के रूप में हमारे सामने आती है जैसे ही कहानी खुलती है। सर्वे सेटलमेंट वाले आये थे और उसके बहाने उसके चरित्र का हनन किया जा रहा है –चौपहर रात को भक् भक् बत्ती जलती है, और पेंसिल शू वाले जूते पहनकर हाकिम आता था घोड़े की तरह यानि पूरी तरह से चरित्र हनन और व्हिस्परिंग में नहीं बल्कि गला खोलकर, पूरे के पूरे गाँव में उसका चरित्र हनन किया जा रहा है, लोग हँस रहे हैं, लेकिन उसी जंगी की पुतोहू को वह जाते हुए आवाज़ देकर बुलाती है कि आओ ना, गाड़ी में बहुत जगह है। अपनी जिस बेटी चम्पिया को वो कहती है कि तू सलीमा के गीत गाती है उसी चम्पिया को गाड़ी में कहती है कि तेरी मास्टरनी यहाँ बैठी है, जंगी की पुतोहू, तो मुझसे क्या डरना? तुम चारों – नरैना की बीवी, चंपिया, जंगी की पुतोहू और सुनरी मिलकर सलीमा के गीत क्यों नहीं गा रही हो? वह उमंग में है, उस समय के पल को उत्साह से जी लेना चाहती है। उसके मन में कोई ईर्ष्या-द्वेष नहीं है, उसमें पावर पॉलिटिक्स,सत्ता का वर्चस्व तो कम-से-कम नहीं है जो पितृसत्ता में है। ये चरित्र हमारे अंदर तक धँस जाते हैं और आज भी हमें लगता है कि हमारे समाज में ऐसे चरित्र क्यों नहीं हैं। ये चरित्र हमें अपने भीतर झाँकने को मजबूर करते हैं कि हम ऐसे चरित्र क्यों नहीं बन सकते? मनुष्य की कोई प्रजाति विलुप्त नहीं होती, उसे हम अपनी सुविधा के लिये लुप्त कर देते हैं। रेणु की कहानियाँ मुझे आँख खोलकर अपने को और अपने समय को पढ़ने वाली कहानियाँ भी लगती हैं और इसीलिये वो एक बहुत बड़े कथाशिल्पी के रूप में मेरे सामने आते हैं।

प्रज्ञा: उनकी कहानी पंचलैट को क्या हम प्रेम कहानी की झलक के तौर पर देख सकते हैं? पर क्या हम इस कहानी में ऐसा एक कोण देख सकते हैं कि पंचों या यूँ कहें कि प्रॉमिनेंट मेल मेम्बर्स क्योंकि पंचों में महिलाएँ तो होती नहीं थी, के बीच किस तरीके से स्त्रीपुरुष का प्रेम दब रहा है?

रोहिणी : पंचलैट प्रेम की राजनीति करने वालों की कहानी है। इसका रूप हमें आज खाप पंचायतों के रूप में देश में दिखाई पड़ता है जिसमें हमारे हरियाणा की भी एक ख़ास भूमिका है। दरअसल फिर से मैं कहूँगी कि ख़ूबसूरत कहानी है, कविता है और भोलापन है। पेट्रोमैक्स लेकर आ रहे हैं, उसे जलाना नहीं आता और यह भी परेशानी है कि दूसरी बिरादरी वाले क्यों आकर जलाएँ, उससे हमारी हँसी होगी। फिर सोचते हैं हमारे यहाँ ऐसा कौन है जो इसे जला सकता है, फिर पता चलता है कि गोधन है। गोधन कौन? जिसको हमने जाति बहिष्कृत कर दिया है। अब यहाँ पर जो अचानक बहती जा रही है कहानी, वहाँ पर बीच में एक पंक्ति डालते हैं रेणु, जिसे अगर हमने पकड़ लिया तो रेणु की कहानी बिल्कुल गहराई में जाकर एक नए अर्थ देने लगती है, लेकिन अगर हम उस चीज़ को नहीं पकड़ते तो हम प्रवाह में बहकर कहानी से आनंदित होते हैं। जब विचार-मनन की ये सारी प्रक्रिया चल रही है कि पेट्रोमैक्स कौन जला सकता है तो वो गोधन याद आता है जो गुलरी काकी की बेटी मुनरी को देखकर सलीमा के गीत गाता था। अब देखिये कि उस समय फिल्मों ने किस तरह से हमारे देहाती समाज को प्रभावित किया था। वो क्योंकि समाज को एक तरह से उन्मुक्त स्त्री-पुरुष सम्बंधों के बारे में बता रहे थे तो किस तरह से, कितने बड़े-बड़े पहरेदार खड़े हो जाते थे। सिनेमा के गीत गाना यानि प्रेम की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करना, यह एक बहुत बड़ा अक्षम्य दंड का भागी होना है। और यह हमें मैला आँचल की कमली में भी दिख रहा है। इसको लेकर सोसाइटी किस तरह से एक पुलिस की भूमिका में आती है इसका चित्रण यहाँ हुआ है कि इसीलिये उसका हुक्का-पानी बंद किया, लेकिन अगली पंक्ति में कहते हैं कि फिर वो दूसरे गाँव का लड़का और पंचों को तो पूछता ही नहीं है, उन्हें पान सुपाड़ी खाने के लिये कुछ देता नहीं है। यहाँ एक दबा हुआ पक्ष सामने आता है जो स्त्री-पुरुष सम्बंधों से परे जाकर सत्ता को, सत्ताधारियों के अहंकार को, उनकी अपेक्षा कोसहलाने की उम्मीद पर चोट करता है कि हमें कहीं न कहीं, कुछ ना कुछ मिलता जाए, थोड़ी-सी रिश्वत मिलती जाए और जहाँ ये नहीं मिलती वहाँ हमारे अहंकार पर चोट लगती है, वर्चस्व पर चोट लगती है कि गोधन हमारे वर्चस्व को नहीं स्वीकर कर रहा। पंचायत की सबसे बड़ी जो चोट है वह यही है कि वह एक प्रतिरोधी स्वर के रूप में दिखाई पड़ रहा है और बहाना वो उसके प्रेम का लेते हैं इसीलिये वो कहते हैं कि पंचायत की इज़्ज़त बचाने के लिये वो उसके जाति बहिष्कृत होने के बंधन को हटा लेते हैं। इन दोनों चीज़ों को हम साइड-बाई-साइड रखकर देखें तो ये कहानी बहुत ख़ूबसूरती से बता रही है कि किस तरह से स्त्री की प्रेम यानि स्त्री की स्वतंत्रता और स्त्री की यौनिकता यानि विवाह सम्बंध की शुचिता को बरकरार रखने के लिये हमारी पंचायतें आज भी सत्ता के नाव को स्त्रियों पर लाद रही हैं और जहाँ उनके अपने निहीत स्वार्थ आड़े आते हैं वहाँ वे अपने फैसलों को भी रिवोक कर देते हैं, उन्हें ख़त्म कर देते हैं। यहाँ एक बहुत बड़ा खेल खाप पंचायतें खेल रही हैं क्योंकि वो नई पीढ़ी के रूप में अपने हाथ में इस्तेमाल किए जाने वाले अपने मोहरों को ही रखना चाहती हैं।

प्रज्ञा: अभी हमने जिन तीन कहानियों की चर्चा की उनसे नैना जोगन नामक उनकी कहानी के पात्र किस तरीके से भिन्न हैं?

रोहिणी अग्रवाल : नैना जोगन बिल्कुल अलग तरह की कहानी है। यहाँ पर संगीत खत्म हो गया है, यहाँ कविता नहीं है दृश्य है लेकिन लपटें उठ रही हैं। अगर मैं बिम्ब में बांधूँ तो नैना जोगन भैरवी है और वो एक सशक्त स्त्री के रूप में हमें दिखती है। ग़ाँव में लोग अपनी स्त्रियों को पृष्ठभूमि में रखते हैं, पुरुष सामने होता है। उसका बाई द वे रेफ़रेंस दिया जाता है। वो आती है लेकिन अपना पूरा स्थान नहीं घेरती और नैना जोगन तो अपने शीर्षक से ही अपने नाम की मुनादी करती हुई आ रही है। उसकी गालियाँ उसके विषदंत कहे गए हैं और लोग कहते हैं कि अपनी इन गालियों के बलबूते पर ग्यारह साल में इन माँ-बेटी ने पंद्रह एकड़ ज़मीन कब्ज़ा कर ली है। उनके चरित्र दमन के लिये भी ठीक वही प्रक्रिया अपनाई गई है। लेकिन रेणु की कहानी में यह उसका बाहरी परिचय है। नैना की गालियाँ बहुत ज़्यादा हैंऔर ऐसी हैं कि गालियों को लिखा भी नहीं जा सकता। नैना जोगन के माध्यम से रेणु एक बहुत ही ख़ूबसूरत उपमा उसको देते हैं कि नैना जोगन को नाम चाहे मैंने दिया है रतनी, रतनी नाम से मैंने उसको नैना जोगन कहा है लेकिन वो भवानी नहीं है, वह तो सरस्वती है। यहाँ इस व्यवस्था के भीतरी संरचना के स्त्री पीड़क स्वरूप को वह बहुत ही मार्मिक ढंग से उजागर करते हैं। वह कहती है कि क्या मैं अछूत हूँ? क्या मैं वैश्या हूँ? क्या मैं घृणित हूँ? तो क्यों मुझसे सब दूर-दूर भागते हैं? आप पूरी कहानी को जब पढ़ते हैं तो उसका एक ही तो कसूर दिखता है, सात बरस की उम्र में उसकी माँ जिस धनी वृद्ध महाशय की हवेली में काम कर रही है, वे रतनी को यौन शोषण का शिकार बनाना चाह रहे थे और रतनी उसका सार्वजनिक खुलासा करती है। मुकदमा भी करती है, कोर्ट कचहरी भी करती है रतनी और उसकी माँ। तो वह स्त्री जो अपनी अस्मिता के लिये, अपने आत्मसमान के लिये, अपने अधिकारों के लिये अकेली लड़ सकती है, खूंखार ढंग से लड़ाई लड़ सकती है और दबंग पुरुष समाज को पटखनी दे सकती है उससे तो निश्चित रूप से समाज घृणा करेगा। यह कहानी एक घृणित स्त्री की कहानी नहीं है, एक स्त्री को घृणास्पद बना दिए जाने की कहानी है। अब देखिये, माधव बाबू जो नैरेटर हैं उन्हीं से वो पंगा ले रही है, उनके बर्तन चोरी हो गये, उनकी चीज़ें चोरी हो गईं, उनके खेत में जो नए बाग लगाए गए हैं वो इन बाग के पौधों को उखाड़ रही है, क्योंकि वो चाहती है कि वो मैदान में आएँ, दो-दो हाथ हो जाए, बातचीत तो हो, तब वो भाव दिखाएगी। वो रोती नहीं है लेकिन पूरा-का-पूरा प्रकरण ऐसा है जैसे वो फूट-फूट कर रो रही है और पूछ रही है कि तुम्हारी माँ और मेरी माँ तो एक ही रही हैं ना? मेरी माँ मेरी बायोलॉजिकल माँ हैं और मेरी माँ का तुमने पाँच साल दूध पिया है तो हमारे बीच एक सम्बंध है, वो सम्बंध कहाँ गायब हो गया? फिर जब गाँव वाले मेरा अपमान कर रहे थे तब तुम कहाँ थे? एक बड़ा सवाल नैना जोगन ने उछाला था कि गाँव की राजनीति क्या मनुष्य के सम्बंधों को निगल सकती है? फिर उसके बाद उसको परेशानी ये है कि उसका ब्याह नहीं हो रहा था तो ये जो गाँव एक कम्यूनिटी फीलिंग के लिये जाना जाता है, जिस समाज में कम्यूनिटी फीलिंग है, सहभागिता, पारस्परिकता का भाव है उस समाज ने क्यों नहीं मेरा विवाह रचाने की कोई कोशिश की? और मेरी माँ द्वारा मेरा जबरा विवाह कराने के बाद ढाई साल से मैं बाँझ हूँ, तुम क्यों नहीं मेरा इलाज कराते? यह एक सशक्त स्त्री से भयभीत पुरुष समाज की कहानी है जो स्त्री का दैहिक शोषण तो कर सकता है लेकिन उसके अधिकारों के साथ खड़ा नहीं हो सकता है। स्त्री को एक मनुष्य का दर्ज़ा नहीं दे सकता है क्योंकि उस समय की बात तो छोड़िए, आज के भी हमारे भारतीय समाज में स्त्री रोती हुई ही अच्छी लगती है, स्त्री अबला ही अच्छी लगती है, स्त्री सौंदर्य के मानकों पर ही पसंद आती है, शेरनी स्त्री किसी को पसंद नहीं आती है और फेमिनिज़्म के ख़िलाफ़त का कारण ही यही है कि वह स्त्री नैना जोगन हो जाती है जो आईना दिखाती है।

प्रज्ञा : रसप्रिया की जो रमपतिया है, हालांकि रमपतिया बहुत बैकग्राउंड में है, उसके बारे में क्या कहेंगी आप?

रोहिणी: मुझे लगता है कि अगर रेणु अपनी किसी कहानी में हीराबाई की कसक को अभिव्यक्त करते, चित्रित करते तो वह रमपतिया जैसी होती। हीराबाई तो चली गई स्टेशन से उसको थैली देकर, कि ये पैसे हैं तुम दुशाला खरीद लेना। अपने प्रेम का थोड़ा-सा बस संकेत देकर लुप्त हो गई। लेकिन उस प्रेम और उसके अंश को कैसे कलेजे में सहेजकर रखा गया, यह रसप्रिया में उद्धृत है। कहानी में यही है कि रमपतिया के बेटे मोहना का पिता कौन है? क्या पिता कमलपुर के नंदू बाबू हैं? या इसके पिता पंचकौड़ी हैं– मिरदंगिया? लेकिन कहानी संकेत दे देती है जब रमपतिया मिरदंगिया से बार-बार कहती है कि तुमने मेरा सर्वनाश किया है, तुमने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा और उसके बाद बार-बार उससे मिलने आती है। तो कहीं वो उसे बताना चाहती है लेकिन वो बता नहीं पाती है कि तुम्हारा अंश मेरी गर्भ में पल रहा है और हम जानते हैं किस तरह से आनन-फानन में उसका विवाह भी रचाया जा रहा है। तो रमपतिया पंचकौड़ी के प्रति अपने प्रेम को किस रूप में अभिव्यक्त कर रही है? वह अपने पुत्र मोहना को हू-ब-हू पंचकौड़ी जैसा बना रही है, उसे पंचकौड़ी के बारे में भी बता रही है, पंचू मिरदंगिया के बारे में भी बता रही है। प्रेम में व्यक्ति क्या करता है? प्रेम में आप जिसके प्रति अनुरक्त हैं दिन-रात उसी का चिंतन-मनन तो होता है। अभिज्ञान शाकुंतलम में शकुंतला के ऊपर अभिशाप के रूप में जो कहर टूटा था वो इसीलिये तो कि वो निमग्न रहती है प्रिय की याद में और उसे होश नहीं। रमपतिया का प्रेम मिरदंगिया की यादों से निर्मित है, उसकी अभिव्यक्ति हमें मोहना के रूप में हो रही है। वह प्रेम में पगी हुई प्रेम प्रवंचिता स्त्री का रूप हमारे सामने रखती है – वो प्रेम प्रवंचिता भी है और जिसने उसे प्रेम में प्रवंचना दी है उसके प्रति अनुरक्त भी है। यह एक आधुनिक स्त्री का विलोम रचने वाली एक स्त्री है जो अपने प्रिय के सामने नहीं आ रही है। कहानी में कितनी ख़ूबसूरती से कहा गया हैकि पंचू चला गया है, वो रमपतिया का सामना नहीं कर सकता है लेकिन जब माँ-बेटा पंचू की अनुपस्थिति में बात कर रहे हैं तो पंचू वहाँ उपस्थित हो जाता है– धा-तिन-तिन-धा! उसकी दूर से जो मृदंग की आवाज़ आ रही है वह किस तरह जैसे उसके प्रेम पर पुष्टि की, समर्थन की और प्रगाढ़तर होते चले जाने के भाव की मोहर लगा रही है। मैं इसे एक बहुत ही ख़ूबसूरत, कोमल, मर्मस्पर्शी प्रेम कहानी कहूँगी जिसमें एसिड अटैक वाली राजनीति नहीं है, जिसमें प्रेमी को धता बताकर अपना करियर बनाने की आकांक्षाएँ भी नहीं हैं। यहाँ एक साझे प्लैटफ़ॉर्म पर ज़माने भर की दूरियों के बीच भी अपने भीतर की एक कोमलता को, तरलता को सींचने के सपने हैं।

प्रज्ञा: कस्बे की लड़की भी रेणु की एक बड़ी लोकप्रिय कहानी रही है, उनके पात्रों को लेकर आपके क्या विचार हैं?

रोहिणी : कस्बे की लड़की कहानी का मिज़ाज, रेणु की कहानी का मिज़ाज नहीं है। अगर रेणु का नाम ना हो तो शायद मैं उसे रेणु की कहानी भी ना मानती क्योंकि रेणु को हमने पूरी तरह से गाँव की, मिट्टी की गंध के साथ जुना हुआ है। रेणु की कहानी पढ़ते हैं तो धान की बालियाँ आती हैं, पगडंडियाँ, बैलगाड़ियाँ और संगीत आता है- कभी मृदंग, कभी ढोलक यानि फोक लोर आता है। कस्बे की लड़की में शहर है हज़ारीबाग,यहाँ पर इन्नोसेंस तो है लेकिन यहाँ इन्नोसेंस के साथ कुटिलता को भी उन्होंने बुन दिया है। यह जो सरोजिनी का पात्र है वह बहुत मासूम भी है, वह बहुत कुटिल भी है। रेणु की ख़ासियत यह है कि वह अपनी कहानियों में अपने पात्रों की वेशभूषा के बारे में, उनके शारीरिक गठन के बारे में, उनके रंगरूप के बारे में नहीं बताते। लाल पान की बेगम को बाद में उसके टीका के रूप में बताते हैं क्योंकि वो ख़ास है। जब वो कहती है कि हाँ, मैं हूँ लाल पान की बेग़म और अपनी शादी की साड़ी और लाल टीके को देखती है –वो वहाँ एक परपस के साथ आता है, लेकिन उसकी आकृति-प्रकृति का परिचय कहीं भी नहीं है। नैना जोगन का भी नहीं है लेकिन इस कहानी में वो पूरी तरह से सरोजिनी की आकृति और प्रकृति दोनों के बारे में बता रहे हैं और वह उसे एक बहुत ही कुरूपा स्त्री के रूप में दर्ज कर रहे हैं। वह मझोले कद की है, दोहरे बदन की है, घोर श्यामवर्णा है, चलते हुए थोड़ा-सा लचककर चलती है, बात करती है तो बात करने से पहले हैं-हैं की ध्वनियाँ करती है, और होंठ हमेशा गीले रहते हैं। यही नहीं, वे कुरुपा स्त्री को सिर्फ कुरूपा ढंग से ही नहीं बताते, बहुत से लोगों के टिप्पणियों के माध्यम से भी उसकी कुरूपता को उजागर करते हैं, जैसे; वह गई है एक रेस्त्रॉ में काला जामुन खाने तो वहाँ उसके साथ प्रियव्रत को देखकर लोग कहते हैं काला जाम और सफेद चमचम। इसी तरह उसको देखकर लोग चीखते हैं कि अरे बाइसन कहाँ से आ गया! काला भैंसा! ये जो कमेंट्स हैं, उसकी कुरूपता को शारपेन, स्ट्रेंथेन करने के लिये की गई लेखकीय युक्तियाँ हैं। हालांकि इस कहानी में लेखक परिवेश से ध्यान हटाकर उसके भीतर, उसके अंतर्मन में घुसे हैं और वो देखते हैं कि एक स्त्री कुरूपा है तो क्या हुआ उसके भीतर भी घर बसाने की, प्रेम करने की, आदर, मान, प्यार पाने की इच्छाएँ तो हैं ना! यदि एक कुरूप स्त्री, काली स्त्री है तो क्या कालापन एक स्त्री के नैसर्गिकअरमानों को खत्म कर देगा? मैं जब ये कहानी पढ़ती हूँ तो मुझे राजेंद्र यादव की निन्नी पात्र की याद आती है। पूरी कहानी बताती है कि वो जहाँ-जहाँ भी जा रही है, वह कह रही है कि लल्लन तुम मेरे साथ थे इसीलिये दुकानदार ने मुझे मीठी गोलियाँ नहीं दीं। आज मैं शिक्षक संघ में गई तो उन्होंने मुझे ज़्यादा इंटरटेन नहीं किया। वहाँ पर वो जाती ही बार-बार इसलिये है कि लोग उसका फ़ायदा उठाते हैं, उसके साथ स्पर्श करते हैं और उसे स्पर्श सुख चाहिए, उसकी देह मांग रही है यह स्पर्श सुख। हमारा समाज उन काम विकृतियों को धीरे-धीरे स्त्री और पुरुष में विकसित कर रहा है और यहाँ कहानी कहीं उसको खींच रही है जब हम देखते हैं कि वो जब बग्घी में या रिक्शे में है तो लल्लन के साथ सटकर बैठी हुई है। उसका यह सटकर बैठना, स्पर्श सुख का आनंद लेना है। हालाँकि नैशनल पार्क में जाकर वह कहती है कि नैशनल पार्क में इंसान खूंखार नहीं होता, इंसान के भीतर का देवता जाग जाता है। तब उसे ऐसा लगता है कि मैं जो लल्लन के साथ इतना आगे बढ़कर इसकी देह का सुख पाना चाह रही थी, यह मेरी गलती है और उस समय लल्लन का कमेंट आता है कि यह मुझे सर्वांग सुंदरी लगी। काले चाम पर, स्थूल देह पर भी प्रेम आ सकता है इसलिये सुंदरता के मानक हमें बदलने होंगे। क्या दैहिक सुंदरता, सुंदरता है या भावगत सुंदरता, सुंदरता है? आज जिस तरह से फ्लायड की हत्या के बाद से विदेशों में रेसिस्ट आंदोलन फैला हुआ है,उस समय तो यह कहानी और भी ज़्यादा प्रासंगिक हो जाती है कि सुंदरता की वही नख-शिख वर्णन और नायिका भेद वाली बंधी-बंधाई टिप्पणियाँ ही क्यों ज़्यादा मायने रखती हैं।

प्रज्ञा : मुझे ऐसा लगता है कि रेणु की रचनाओं में जो स्त्रियों का चित्रण किया गया है, कहीं न कहीं वे पात्र आज भी प्रासंगिक हैं। हम यह पूरी तरह से नहीं कह सकते कि ये सिर्फ उनके दौर के ही पात्र हैं।

रोहिणी :बिल्कुल! साहित्य की यही तो ख़ूबसूरती है कि वो जिस समय को पीछे छोड़ता है वह छूटता नहीं है।वो समय हमारे समय की धारा में घुल-मिलकर समय को अखंड स्वरूप दे देता है।

प्रज्ञा : जब रेणु का दौर था तो क्या उस दौरान महिला को, स्त्री को एक व्यक्ति के रूप में पहचान मिल रही थी?

रोहिणी : ये संघर्ष तो कब से चल रहा है। उस समय के जो तीन महत्वपूर्ण रचनाकार थे – मन्नू भंडारी, उषा प्रियंवदा और कृष्णा सोबती, उनकी रचनाओं में लड़ाई तो इसकी फोरफ्रंट पर है। उनकी रचनाओं में बॉयकॉट के रूप में पूरा का पूरा स्थान स्त्री ही ले रही है क्योंकि अपनी नायिकाओं के माध्यम से वो अपने समय की सम्वेदनाओं और अपनी ज़िद, अपने संघर्ष को कह रही हैं। उनकी लड़ाई भी इस पितृसत्ता से लड़ने में है, इस पुरुष ग्रंथि की श्रेष्ठता से लड़ते हुए वे अपना स्पेस चाहती हैं। वो चाहती हैं कि हमें अपना मित्र समझिए लेकिन देह को एक ग्रंथि की तरह हमारे दिमाग में इतना बिठा दिया गया है कि स्त्री की देह के अतिरिक्त स्त्री के पार देखने की दृष्टि आज भी नहीं आ रही है।

प्रज्ञा: हम कह सकते हैं कि रेणु का दौर कहानियों का दौर था, उपन्यासों का दौर था। उस दौर में उनके समकालीन कथाकार किस तरह की रचनाएँ रच रहे थे?

रोहिणी : रेणु नई कहानी आंदोलन के एक ब‌ड़े कहानीकार हैं और उनके समय में उन ही की तरह ग्रामीण परिवेश को लेकर लिखने वालों में मार्कंडेय और शेखर जोशी हैं लेकिन ग्रामीण परिवेश के अतिरिक्त नगरों, महानगरों, कस्बों को लेकर लिखने वालों में उनका जो स्त्री का चित्रण है वह बिल्कुल अलग तरह का है।

प्रज्ञा : रोहिणी जी, आपका बहुत-बहुत शुक्रिया! आपने हमें रेणु की कहानियों में के स्त्री पात्रों की व्यथा-कथा, उनके इगो, महत्व, मजबूरियों सहित स्त्री के प्रति उस समय के समाज के दृष्टिकोण व इससे संबंधित अलग-अलग पहलुओं का बहुत ही गहराई से विश्लेषण किया। इस रचनात्मक चर्चा के लिये और हमसे जुड़ने के लिये आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

रोहिणी : मैं भी आभारी हूँ कि रेणु के साथ थोड़ा वक्त बिताने का, रेणु के बारे में बात करने का मौका दिया आपने। शुक्रिया!

प्रज्ञा : मैं पाठकों से भी विदा लेना चाहूँगी। उम्मीद है कि आपको हमारी चर्चा अच्छी लगी होगी। फिलहाल हमारी बातचीत यहीं रुकती है,आपसे फिर होगी कभी मुलाकात, फिर होगी बात तब तक के लिये गुनगुनाते रहिये ज़िंदगी की रचनात्मक धुनों पर!


प्रज्ञा तिवारी: शिक्षा : स्नातक (हिंदी), लेडी श्री राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय। स्नातकोत्तर (हिंदी), हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय। अंग्रेज़ी-हिंदी अनुवाद उपाधिपत्र,दिल्ली विश्वविद्यालय। प्रभाकर, शास्त्रीय संगीत (गायन)।प्रभाकर, सितार वादन। अनुभव क्षेत्र : दूरदर्शन, आकाशवाणी तथा विभिन्न भारतीय मंत्रालयों, प्रॉडक्शन हाउस, वेब चैनलों व थियेटर ग्रुप्स के लिए कविता, कहानी, स्क्रिप्ट, कॉपी, गीत व आलेख लेखन। नेटवर्क 18 चैनल के हिंदी कार्यक्रमों की पूर्व क्वालिटी कंट्रोलर। कम्यूनिटी रेडियो ‘रेडियो बुंदेलखंड’ की पूर्व क्रिएटिव हेड। पी.आर एजेंसी में पूर्व कंटेंट राइटर। विभिन्न ग़ैर-सरकारी संस्थाओं में पूर्व कंटेंट व कम्यूनिकेशन्स मैनेजर। साहित्य जगत से जुड़ाव : उपन्यास ‘दोस्ती प्यार यार’ व कविता संग्रह ‘कभी सोचा है’ का प्रकाशन। ऑल इंडिया रेडियो के सर्वभाषा कवि सम्मेलन में भागीदारी। रमणिका फाउंडेशन में सम्पादिका व अनुवादक के तौर पर योगदान। विभिन्न कहानी संकलनों,प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं तथा वेब पोर्टल्स में रचनाओं का प्रकाशन। गूगल व हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा ‘है बातों में दम’ की विजेता। सम्मान : ‘श्री भारत भूषण अग्रवाल सृजनात्मक लेखन पुरस्कार’,‘वूमेन प्रेस कोर अवार्ड’,‘विष्णु प्रभाकर साहित्य सम्मान’,‘नवोदित लेखक (कविता) सम्मान’,‘एक्सेलेंस इन शूटिंग (राइफ़ल)’,‘बेस्ट स्टूडेंट, लेडी श्री राम कॉलेज (2003)’ सम्प्रति : कॉपी राइटर (ऐड एजेंसी), स्क्रिप्ट राइटर (आकाशवाणी), रेडियो जॉकी(आकाशवाणी),को-फ़ाउंडर व क्रिएटिव हेड (ब्रीदिंग स्ट्रीट वेब चैनल), बोर्ड ऑफ डायरेक्टर (पश्यन्ती वेबसाइट), इंस्टाग्राम पर लोकप्रिय #HINDICLASS का संचालन। ईमेल: pragyatiwarywrites@gmail.com


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