नयी आमद

साहित्य में अकेले कंठ की वे पुकार थे

प्रेमचंद परिवार से जुड़े हिंदी के प्रसिद्ध लेखक अजितकुमार को साहित्य विरासत में मिला था। उनकी मां सुमित्रा कुमारी सिन्हा शिवरानी देवी की समकालीन लेखिका थीं और उस जमाने की प्रमुख प्रकाशक भीथीं। बच्चन परिवार के अंतरंग रहे अजित कुमार के संचयन ‘अंजुरी भर फूल’ (संपादक: पल्लव) के बहाने हिंदी के वरिष्ठ कवि पत्रकार विमल …

जीवट पिताओं की अंतिम पीढ़ी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि देती एक किताब

‘कारी तू कब्बि ना हारी’ एक साधारण शिक्षक के जीवन-संघर्ष की गाथा है, जो विषम परिस्थितियों से जूझता है, लेकिन कर्तव्यनिष्ठा के बल पर गाढ़े समय से पार पा लेता है। यह एक आम आदमी की विजय-गाथा है। इस आपाधापी भरे जीवन में ‘जीवन के शाश्वत् मूल्यों’ का निर्वहन करना किसी चुनौती से कम नहीं …

कृष्णा सोबती की अनोखी प्रेम कथा

विमल कुमार क्या आपने अपने शहर में या अपने मोहल्ले में किसी 75 वर्ष की महिला को शादी रचाते हुए देखा है? शायद नहीं देखा होगा। वैसे, आमतौर पर विदेशों में इस तरह की शादियां होती हैं लेकिन भारतीय समाज में ऐसा लगभग न के बराबर होता है पर अपवाद स्वरूप कुछ ऐसी शादियां हुई …

केदारनाथ सिंह से एक मुकम्मल भेंट

डॉ. सुलोचना दास कवि केदारनाथ सिंह, इस नाम से हिंदी पट्टी का विरला ही कोई होगा जो परिचित न हो। किंतु परिचित होना और जानना एक बात नहीं है। एक कवि को जानने के लिए पहले उसके व्यक्तित्व को जानना, उससे रू-ब-रू होना आवश्यक है। चकिया, बलिया जिला के अन्तर्गत आने वाला एक छोटा-सा गांव …

आलोचक संग संवाद: अनल पाखी

गगनदीप सृजनशीलता अपने आप में बड़ी चुनौती है, जो साहित्यकार को दिन-प्रतिदिन नवीन प्रेरक भूमि प्रदान करती है, जिससे एक कालजयी कृति का निर्माण सम्भव हो पाता है। साहित्य की विविधता का विकास मनुष्य के बौद्धिक स्तर पर आधारित है। जैसे-जैसे मानव का वैचारिक धरातल विस्तृत हुआ, साहित्यक गति में भी तीव्रता आई। आधुनिक युग …

क्या मैथिलीशरण गुप्त का सही मूल्यांकन नही हुआ?

विमल कुमार रज़ा फाउंडेशन ने गत दिनों जैनेंद्र, नागार्जुन, कृष्णा सोबती और रघुवीर सहाय की जीवनियां प्रकाशित की। इस कड़ी में रजनी गुप्त द्वारा लिखी राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जीवनी ‘कि याद जो करें सभी’ हाल ही में आई है। इन दिनों लखनऊ में एक बैंक मे कार्यरत रजनी जी की कहानियों और उपन्यासों से …

स्वीकृति और अस्वीकृति के द्वंद्व की कथा

अनिल अविश्रांत युद्ध में राजवंशों के जय-पराजय के रक्तिम वृतान्तों  के बीच इतिहास के ध्वांशेषों में कई बार बहुत सुन्दर प्रेम कथाओं की भी झलक मिलती है। इतिहास चाहे इन्हें महत्व न दे लेकिन जब एक साहित्यकार की दृष्टि इन पर पड़ती है तो ‘राजनटनी’ जैसी रचना जन्म लेती है। गीताश्री ने बारहवीं सदी के …

शिवरानी देवी प्रेमचंद से अधिक क्रांतिकारी थीं

विमल कुमार “अभी तक साहित्य जगत ने उनके (शिवरानी देवी) साथ न्याय नहीं किया क्योंकि मेरा व्यक्तित्व उनके व्यक्तित्व को ढक लेता है। शायद कुछ आदमी सोचते होकि उनकी रचनाओं का वास्तविक लेखकमैं ही हूं। मैं इनकार नहीं करता क्योंकि रचनाओं में साहित्यिक सजावट मेरी है लेकिन विचार और लेखन सर्वथा उन्हीं के होते हैं। …

यहाँ नहीं तो कोई रास्ता वहाँ होगा

आनन्दवर्धन द्विवेदी ग़ज़ल उर्दू की एक ऐसी आज़माई हुई कविता कहने की शैली है जिसे बड़े-बड़े उर्दू के उस्ताद शायरों ने अपनी प्रतिभा और भाषा तथा अभिव्यंजनाओं की एक-से-एक बेजोड़ अनुपमेय विशिष्टताओं के खाद-पानी से सींचा-संवारा है, जिससे समय की शताब्दियों लम्बी अनगढ़ यात्रा के बीच जिसके पुष्पों के रंग और पराग की सुगंध म्लान …

“कविता केवल शब्दों का जोड़ नहीं है, सिनेमा केवल सीन नहीं है”

विभावरी वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज की अभिनेता इरफ़ान खान पर लिखी किताब ‘इरफ़ान : …और कुछ पन्ने कोरे रह गए’ पर बात शुरू करते हुए मैं उस चिट्ठी का ज़िक्र करना चाहूंगी जो इरफ़ान ने अजय जी को उस वक़्त लिखी थी जब अपने इलाज के दौरान वे लन्दन में थे. यह चिट्ठी इस …

घने अंधकार में रोशनी की तलाश

प्रेम नंदन वत्स आज सत्य के कई रूप हो गए हैं। जहाँ तक हमारी दृष्टि जा पाती है, हम उस सत्य तक उतना ही पहुँच पाते हैं। आज कई सारी बातें आपस में धागों की तरह उलझी हुई हैं। इन उलझे हुए सत्यों के धागों के सिरों को पकड़कर सुलझाने की कोशिश है उमाशंकर चौधरी …

कथा साहित्य को एक अनुपम भेंट है यह उपन्यास

महेश जोशी फ़ेसबुक पर मित्रता में कभी-कभार विचित्र अनुभव होते हैं : प्रियदर्शी ठाकुर को मित्र बनाने का प्रस्ताव उन्हें स्वर्गीय जनार्दन ठाकुर का पुत्र जानकर भेजा, किन्तु निकले वे उनके छोटे भाई। लगभग चालीस वर्ष पहले जनार्दन ठाकुर अंग्रेज़ी के जाने-माने पत्रकार व पोलिटिकल कमेंटेटर थे और हम ‘नई दुनिया’ में उनके आलेखों के …

काल्पनिक नहीं.. कल्पनाशील कथाएँ

उपमन्यु गर्ग बेस्टसेलर का अंग्रेज़ी तमग़ा हासिल करने के लिए हिन्दी साहित्य में क्रमशः वही स्थिति उत्पन्न होती जा रही है जो चेतन भगत के बाद इंग्लिश में हुई. जैसे एक तय फ़ार्मूला हाथ लग गया है जो वेब सीरीज़ में आए मार्केट बूम को भी भुना लेना चाहता है इसलिए उसको भी लक्ष्य करके …

सत्यान्वेषण की ईमानदार कार्यवाही उर्फ़ ‘आलोचना की पक्षधरता’

अंकित नरवाल ‘आलोचना को हर हाल में गलत बनाम सही, झूठ और अपर्याप्त सच बनाम सच का रूप ग्रहण करना ही चाहिए।’–विजयदेव नारायण साही हिन्दी आलोचना के इतिहास में किसी भी तरह की ‘पक्षधरता’ के सवालों को दरअसल पार्टीगत व दलगत समीकरणों के मार्फत ही समझने की परंपरा रही है। व्यापक अर्थों में उसे सत्यान्वेषण …