जो शामिल हैं इस दुनिया की तबाही में

विस्‍थापन, पीड़ा और दुश्‍चिंताओं की इबारत ओम निश्चल लीलाधर मंडलोई एक बेचैन कवि हैं। कुछ कवि होते हैं जिनके पास कहने को बहुत कुछ होता है और बार बार वे उस पीड़ा का इज़हार करते हैं जिससे यह पूरी मनुष्‍यता गुज़र रही है। कहने को हम विश्‍वबंधुता का ढोल अक्‍सर पीटते हैं पर पूरी दुनिया …

एक संकल्प यात्रा हिन्दी त्रैमासिक ‘शीतलवाणी’ की

शैलजा सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर से हिन्दी के फलक पर एक बड़ी इबारत लिखी जा रही है। इबारत लिखने का काम कर रही है सहारनपुर से प्रकाशित हिन्दी की एक साहित्यिक पत्रिका ‘शीतलवाणी’। इस साहित्यिक त्रैमासिक का सफ़र यूँ तो करीब 40 साल पुराना है लेकिन गत 12 वर्षों में …

मंज़िले-मकसूद

हाल ही में कथाकार तरुण भटनागर का उपन्यास ‘बेदावा’ राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित हुआ है। इन दिनों ‘बेदावा’ चर्चा में है। उपन्यास का एक बहुत ही रोचक अंश आपके लिए पुस्तकनामा पर… (सुधीर देख नहीं सकता। वह बचपन से अंधा है। एकदम नाबीना। पर खूबसूरत मोमबत्तियाँ बनाता है। अपर्णा उससे मोमबत्तियाँ बनाना सीखती है। …

समय समाज की निर्मम समीक्षा :वैधानिक गल्प

पंकज मित्र वैसे तो चंदन पाण्डेय के पहले उपन्यास ‘वैधानिक गल्प’ की अति सरलीकृत व्याख्या यह हो सकती है कि यह लव जिहाद और भीड़ हत्या के विषय पर लिखा गया है परंतु भीड़ को हत्यारी भीड़ में बदलने और इस कौशल से बदलने कि भीड़ को अहसास भी न हो कब वह कातिल  भीड़ …

…क्योंकि ‘कथा’ से आगे जहाँ और भी हैं

असीम अग्रवाल स्वयं प्रकाश प्रतिष्ठित कथाकार हैं, यह सबको पता है, लेकिन उन्होंने ‘कथा-साहित्य’ से भी अलग लिखा है। उनकी नयी पुस्तक ‘धूप में नंगे पाँव’ इसी तरह की कथेतर रचना है, तथा कथेतर साहित्य की दृष्टि से एक ज़रूरी प्रयास है। यह नहीं कहा जा रहा कि ‘कथा-साहित्य’ की ज़रूरत नहीं, बल्कि साहित्य में …

नींव के पत्थर नींव में ही समाते है

राजेंद्र शर्मा कल रात में सूचना मिली कि सहारनपुर के वरिष्ठ रंगकर्मी भाई वसी-उर-रहमान इस फ़ानी दुनिया से रूखसत हो गये हैं और देर शाम उन्हें गोटेशाह क़ब्रिस्तान में खाक-ए- सुपुर्द किया गया। इसे समय की विडम्बना ही कहा जाये कि जिन रंगकर्मी दोस्तों के साथ जीवन भर अभिनय करते रहे, सैट बनाते रहे, मंच …

कबीर के आहृवान की भूमिका

सुनील कुमार युवा कवि, कथाकार, आलोचक भरत प्रसाद की चुनी हुई कविताओं का संग्रह ‘पुकारता हूँ कबीर’ समाज के कई मुद्दों को आईना दिखाती हुई नजर आती है। अमन प्रकाशन से प्रकाशित इस काव्य संग्रह की प्रत्येक कविताओं में समाज से टकराहट की अनुगूँज सुनाई पड़ती है। महात्मा कबीर केवल संत कवि ही नहीं थें …

शैलेन्द्र : होठों पर सचाई और दिल में सफाई का अमर कवि, गीतकार

संजीव श्रीवास्तव सिनेमा में साहित्य से सीधा सरोकार रखने वाले लेखकों, कवियों की संख्या कभी कम नहीं रही। शैलेन्द्र ऐसे ही कवि, गीतकार थे जिनकी शख्सियत को आम सिनेमा प्रेमियों से लेकर सरोकारी साहित्यकारों के बीच भी प्रतिष्ठा हासिल थी। संभवत: शैलेन्द्र अकेले ऐसे गीतकार हुए जिनकी लेखनी पर नामधन्य साहित्यकारों ने भी काफी लिखा …

ठहरना भी किस तरह : अंतिम अरण्य

पूनम अरोड़ा कोई भी कृति नितांत रूप से एक व्यक्तिगत यात्रा होती है. एक ऐसी यात्रा जिसकी राह पर चलते-चलते हम अनजाने में ही कुछ छोटे कंकड़ (स्मृतियाँ) अपने सामान के साथ रख लेते हैं या कभी किसी ध्वनि के साथ अपने अतीत में खो जाते हैं. लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर वे स्मृतियाँ …

संघर्ष में लय की खोज की कवितायेँ– ‘क्षीरसागर में नींद’

अनिल कुमार पाण्डेय कविता में जब जन-सरोकारों के संरक्षण की बात आएगी तो कवि की निष्क्रियता एवं निष्पक्षता को लेकर सवाल किया जाएगा. किसी भी देश के सांस्कृतिक समाज और सामाजिक संस्कृति की समृद्धि कवि-विवेक और कविता-सामर्थ्य पर निर्भर करता है. जनसामान्य यहाँ एक हद तक उत्तरदायी नहीं होता जितने कि बुद्धिजीवी. साधारण जनता से …

सामाजिक सरोकारों की कहानियों का अनूठा संग्रह

दीपक गिरकर “प्रवास में आसपास” सुपरिचित प्रवासी कथाकार डॉ. हंसा दीप का दूसरा कहानी संग्रह है। डॉ. हंसा दीप टोरंटो में कई वर्षों से रह रही हैं। वे अमेरिकी-कनाडा संस्कृति से अच्छी तरह से परिचित होने के बावजूद अपनी भारतीय संस्कृति तथा भारतीय रीति-रिवाजों को नहीं भूली हैं। भारत के मेघनगर (जिला झाबुआ, मध्यप्रदेश) में …

साहित्य की सही रेसिपी

धर्मपाल महेंद्र जैन इन दिनों साहित्य में रस नहीं रहा, निचुड़ गया है। साहित्य क्विंटलों में छप रहा है और सौ-दो सौ ग्राम के पैकेट में बिक रहा है। जगह-जगह पुस्तक मेलों में बिक रहा है पर रसिकों को मज़ा नहीं आ रहा। साहित्य को सर्वग्राही होना चाहिये, समोसे जैसा होना चाहिये। जहाँ प्लेटें उपलब्ध हों वहाँ …

प्यार ही तुम सबका नियम होना चाहिए

गीताश्री ख़लील जिब्रान के जीवन की एक महत्वपूर्ण स्त्री मिस हैशकल ख़लील को ये बात समझाती है. युवा साथी पंकज कौरव का उपन्यास “शनि: प्यार पर टेढ़ी नजर” का मूल स्वर यही पहचान पा रही हूँ. प्यार और विश्वास दो ऐसे नक्षत्र हैं जो आपस में जुड़े हैं. एक घटित होता है तो दूसरा चमक …

मज़दूरों जीवन की पीड़ा का आख्यान : धर्मपुर लॉज

राजनारायण बोहरे “धर्मपुर लॉज” उस पीरियड उपन्यास का नाम है जो कथाकार प्रज्ञा ने  दिल्ली की सब्जी मंडी, मुकीम पुरा, बिरला मिल, घंटा घर और आसपास के जनजीवन पर लिखा है । इस उपन्यास का कालखंड सन 1980 से 1998 के बीच का है।  धर्मपुर लॉज उस भवन का नाम है, जो कि बिरला मिल …