विमल कुमार भारतीय वांग्मय, भाषा और साहित्य के निर्माण में विदेशी विद्वानों का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। सर विलियम जोन्स से लेकर मैक्समूलर और जॉर्ज ग्रियर्सन ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है लेकिन हिंदी साहित्य के जो पाठ्यक्रम बने, उसमें इन तीनों विद्वानों की चर्चा आमतौर पर नहीं है लेकिन जब कोई शोधार्थी …
हरिशंकर शाही “और तुम्हारी वह ज़बरदस्त चुटिया क्या हुई?” “तुम्हारी दाढ़ी के काम आई गई?” टोपी ने जलकर कहा। हिंदी साहित्य की किताबों में तमाम एक से बढ़कर एक कहानियाँ हैं, उपन्यास हैं, और कथाएँ हैं जो कहीं तो आत्म-कथा हैं तो कहीं आंखों देखी कथा और या किसी ऐतिहासिक काल की कथाएँ हैं। यह …
इश्राकुल इस्लाम माहिर मण्टो ने कहा है कि “ज़माने के जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं अगर आप उससे वाकिफ नहीं तो मेरे अफसाने पढ़िये और अगर आप उन अफसानों को बरदाश्त नहीं कर सकते इसका मतलब है कि ज़माना नाकाबिले–बरदाश्त है।” साहिर लुधियानवी का मशहूर शे’र है– दुनिया ने तज्रिबातो–हवादिस की शक्ल में …
विमल कुमार क्या आप ग्लोरिया स्टायनेम को जानते है? शायद नही जानते होंगे। सेकंड सेक्स की मशहूर लेखिका सिमोन द बुआ की तरह वह भारत के हिंदी जगत में नही जानी जाती है। वह जर्मन ग्रीयर और केट मिलेट की तरह भी शायद जानी जानी होंगी लेकिन पिछले कुछ सालों से हिंदी में स्त्रीवादी लेखन …
शशिभूषण द्विवेदी कई बार कुछ किताबें भविष्यवाणी की तरह होती हैं। स्कॉटलैंड में जन्में और पले-बढ़े पीटर मे का ‘लॉकडाउन’ एक ऐसा ही उपन्यास है जो 2005 में बर्डफ्लू की महामारी के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया था। अब कोविड-19 महामारी के दौर में यह नए रूप में नए संदर्भों के साथ सामने आया है। पीटर …
वंदना राग हर चर्च में एक क्वायर होता है.लड़के-लड़कियों का, स्त्रियों और पुरुषों का, जो आस्थावान और बे- आस्था सबको अपने धीमे गायन से आध्यात्मिक दुनिया की ऐसी गलियों में लिए चलता है कि मन भीग जाता है। उपन्यास ‘अँधेरा कोना’ पढ़ते हुए एक ऐसा ही धीमा दुःख मन को जकड़ने लगता है और फिर …
पल्लव मैं एक आम हिंदुस्तानी हूँ। जैसा भारतीय मध्य वर्ग का परिवेश है मैं उसी में पला-बढ़ा। जब मैं दसवीं में पढता था, तब उसी साल प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें मानकर आरक्षण की नयी व्यवस्था लागू करने की घोषणा की थी। इस पर तथाकथित सवर्ण तबके की तीखी प्रतिक्रिया हुई। मेरे शहर (चित्तौड़गढ़ ) …
पूनम अरोड़ा कोई भी कृति नितांत रूप से एक व्यक्तिगत यात्रा होती है. एक ऐसी यात्रा जिसकी राह पर चलते-चलते हम अनजाने में ही कुछ छोटे कंकड़ (स्मृतियाँ) अपने सामान के साथ रख लेते हैं या कभी किसी ध्वनि के साथ अपने अतीत में खो जाते हैं. लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर वे स्मृतियाँ …
गीताश्री ख़लील जिब्रान के जीवन की एक महत्वपूर्ण स्त्री मिस हैशकल ख़लील को ये बात समझाती है. युवा साथी पंकज कौरव का उपन्यास “शनि: प्यार पर टेढ़ी नजर” का मूल स्वर यही पहचान पा रही हूँ. प्यार और विश्वास दो ऐसे नक्षत्र हैं जो आपस में जुड़े हैं. एक घटित होता है तो दूसरा चमक …
“ये बार डांसर…हाड़-मांस की नहीं बनी. ये तो सिर्फ नखरों से बनीं हैं. कुछ ख़ास बारों में ये आ कर आपकी बगल में बैठ जाएँगी और कहेंगी- हेल्लो हेन्सम, क्या मैं तुम्हारा सेल इस्तेमाल कर सकती हूँ या हाय स्वीटी तुम कैसे हो? और स्वाभाविक है कि आप उत्तेजित हो जायेंगे”










