किताब और मैं

क्या आपने रूमी की शायरी पढी है?

विमल कुमार       (मैं क्या करूं, ऐ मुसलमानों! मैं खुद अपने आप को नहीं पहचानता। न मैं ईसाई हूँ, यहूदी न अग्निपूजक  और नहीं मुसलमान। ना मैं पूरब का हूं ना पश्चिम का, ना धरती का न सागर का न मैं प्रकृति द्वारा गढ़ा  गया हूं और ना ही मंडरानेवाला आसमान से आया हूं। न …

‘परम प्रेम’ का तिलिस्मी शीशा : आन्ना कारेनिना

मनीषा कुलश्रेष्ठ आन्ना कारेनिना लिखे जाने के दौरान दर्ज की गईं अपनी आत्मस्वीकारोक्तियों में तॉल्स्तोय लिखते हैं— “हर बार, जब भी मैं ने अपनी गहन इच्छाओं के तहत, नैतिक स्तर पर अच्छा अभिव्यक्त करने की कोशिश की – मैं अवमानना तथा तिरस्कार से गुज़रा. फिर जब-जब मैंने मूल प्रवृत्तियों पर लिखा, मुझे प्रशंसा व प्रोत्साहन …

डॉ. केदारनाथ सिंह के कक्षा-व्याख्यान के आलोक में ‘उषा’ कविता

प्रस्तुतकर्ता : उदयभान दुबे [‘उषा’ शमशेर बहादुर सिंह की एक छोटी किन्तु महत्वपूर्ण और बहुचर्चित कविता है। मैंने हाल ही में फेसबुक पर इस कविता पर एक चर्चा सुनी जिसमें डॉ. गोपेश्वर सिंह, डॉ. रामजन्म शर्मा, डॉ. सुरेश शर्मा और डॉ चंद्रा सदायत भाग ले रहे थे। यूट्यूब पर भी इस कविता के संबंध में …

एक आत्मिक बंधन

पल्लवी प्रकाश I seem to have loved you in numberless forms, numberless times…In life after life, in age after age, forever. –Tagore रवीन्द्रनाथ टैगोर यहाँ प्रेम की जिस शाश्वतता की बात करते हैं, उसी की अगली कड़ी है सोलमेट. सोलमेट, यानी आत्मा का अनिवार्य साथी. वह संबंध, जहाँ आत्मा का आत्मा से सीधा जुड़ाव हो …

मल्लिका : हिंदी के इव और एडम की दास्‍तान

इरा टाक मल्लिका एक ऐसी आजाद, बुद्धिजीवी स्‍त्री की दास्‍तान है जिसने सामाजिक विडम्‍बनाओं के दिल दहला देने वाले घेरों के बीच अपने लिए अपने सामाजिक मूल्‍य स्‍वयं रचे। एक अलग बागीपन, एक अलग आजाद खयाली, एक अलग निश्‍छलता, एक अलग आत्‍मविश्‍वास। आज से लगभग डेढ़ सौ साल पहले के भारत में ऐसी स्‍त्री की …

यह दौर महिला उपन्यासकारों का है

विमल कुमार कहा जाता है कि ‘उपन्यास’ की अवधारणा दरअसल औद्योगिक क्रांति के बाद पश्चिम में विकसित हुई थी और वहां से यह भारत में आई थी लेकिन भारत में ‘गल्प’ और ‘वृतांत’ या ‘आख्यान’ की परंपरा में यह उपन्यास मौजूद रहा। आज हम जिस रूप में उपन्यास की चर्चा करते हैं उस उपन्यास शब्द …

रस्‍किन बॉन्‍ड को मसूरी से मोहब्‍बत हैं

राजेन्‍द्र शर्मा अपने जीवन के 86 बसंत देख चुके मशहूर लेखक रस्‍किन बॉन्‍ड का आज जन्‍मदिन है। बच्‍चों जैसी उन्‍मुक्‍तता का जीवन जीने वाले रस्‍किन को प्रकृति और बच्‍चे सबसे प्रिय रहे है। छोटी छोटी गोल मटोल ऑखों में गजब की चंचलता और नटखटपन वाले रस्‍किन हर बार अपना जन्‍मदिन दूरदराज से आये बच्‍चों के …

दिल्ली के दिल का एक रास्ता यहां से भी गुजरता है…!

सारंग उपाध्याय मनुष्य सभ्यता के पास विस्थापन के दर्द पुराने हैं और पलायन के घाव आज भी हरे. जो उजड़कर बसे उनकी जमीन खो गई और जो बसे-बसाए थे वे अपने ही घर में बंजारे हो गए. यह बंजारापन आज भी बदस्तूर है. कोई आपसे ये पूछे की आप कहां से हैं—तो बेधड़क कह देना हम …

युद्ध और शांति : प्रकाशन के डेढ़ सौ साल

सिनीवाली लियो तोलस्तोय की बहुचर्चित कृति ‘युद्ध और शांति’ के प्रकाशन के डेढ़ सौ साल हो चुके हैं। इतना लंबा समय बीत जाने के बाद भी न तो इसकी लोकप्रियता कम हुई है और न ही इसकी प्रासंगिकता। उनकी विभिन्न कृतियों में उनके दार्शनिक विचारों ने हर पीढ़ी को प्रभावित किया है। तोलस्तोय अपने जीवन …

औरतें खुदकुशी क्यों करती हैं?

शशिभूषण द्विवेदी ‘पुस्तकनामा’ के स्तम्भ ‘इन दिनों पठन-पाठन’ के लिए कथाकार शशिभूषण द्विवेदी से हमने उनके द्वारा इन दिनों पढ़ी जा रही किताबों पर प्रतिक्रियाएँ मांगी थी और उन्होंने एक बड़ी समीक्षा ज्ञानपीठ से प्रकाशित सुरेश गौतम के उपन्यास ‘प्रेम कथा : रति जिन्ना’ पर लिखने का वादा किया भी था। दिनांक 22 अप्रैल को …

सौ वरियाँ दा जीवणा

पल्लव आत्मकथा की कसौटी क्या है? आत्मकथा कोई क्यों पढ़े? क्या उस सम्बंधित व्यक्ति के जीवन में ऐसा कुछ है जो पाठक को अपने लिए जानना आवश्यक लगता है इसलिए वह आत्मकथा पढ़े? आत्मकथा के मूल्यांकन में ये सभी सवाल खड़े होते हैं। और इनका कोई सर्वसम्मत जवाब नहीं खोजा जा सकता। जवाब कोई है …

एक आधे-अधूरे में पूरा अभिसार

लीलाधर मंडलोई “इतना भी कवि नहीं मैं कि तुझमें ढूंढूं अपनी प्रागैतिहासिक प्रेमिकाएं न इतना अंधविश्वासी कि बांधू तुझे किसी पिछले जन्म के उत्तरीय से मगर कुछ तो है कि स्वयं को देह और इतिहास के बाहर देखने लग जाता हूँ” (यक्षिणी पृ.18) हे कवि! यह चेतनावस्था के उदगार हैं न?   देह और इतिहास से …

तुम एक किताब में कैद नहीं हो वॉन गॉग..!

सारंग उपाध्याय कला उम्‍मीदों का सवेरा है. कला के औजार ही मनुष्‍यता को निखारते हैं और उसकी आत्‍मा संवारते हैं. कला इतिहासकार आर्नल्‍ड हाउजर ने ठीक कहा है- ”कला उन्‍हीं की मदद करती है जो उससे मदद मांगते हैं, जो अपने विवेक के संशय, अपने संदेहों और अपने पूर्वग्रहों के साथ उसके पास आते हैं. …

ज़बरदस्त फ़ील गुड फ़ैक्टर है इन कहानियों में

प्रियदर्शी ठाकुर ‘ख़याल’ नंद भारद्वाज हिन्दी तथा राजस्थानी के सुविख्यात कवि एवं कथाकार हैं। उनकी कहानियों का नया संकलन “आपसदारी” अभी हाल ही में हासिल हुआ। मैं कोई नक़्क़ाद या समीक्षक नहीं; छोटी-मोटी शायरी, अनुवाद, ऐतिहासिक उपन्यास आदि में लगा रहता हूँ; नंद जी की इन कहानियों पर कुछ लिखूंगा यह तो ठीक से सोचा …