युद्ध और शांति : प्रकाशन के डेढ़ सौ साल

सिनीवाली लियो तोलस्तोय की बहुचर्चित कृति ‘युद्ध और शांति’ के प्रकाशन के डेढ़ सौ साल हो चुके हैं। इतना लंबा समय बीत जाने के बाद भी न तो इसकी लोकप्रियता कम हुई है और न ही इसकी प्रासंगिकता। उनकी विभिन्न कृतियों में उनके दार्शनिक विचारों ने हर पीढ़ी को प्रभावित किया है। तोलस्तोय अपने जीवन …

औरतें खुदकुशी क्यों करती हैं?

शशिभूषण द्विवेदी ‘पुस्तकनामा’ के स्तम्भ ‘इन दिनों पठन-पाठन’ के लिए कथाकार शशिभूषण द्विवेदी से हमने उनके द्वारा इन दिनों पढ़ी जा रही किताबों पर प्रतिक्रियाएँ मांगी थी और उन्होंने एक बड़ी समीक्षा ज्ञानपीठ से प्रकाशित सुरेश गौतम के उपन्यास ‘प्रेम कथा : रति जिन्ना’ पर लिखने का वादा किया भी था। दिनांक 22 अप्रैल को …

अपने समय का अंतर्पाठ करती ये कविताएं

उमा शंकर चौधरी हिन्दी कविता में जिन कवियों के यहां राजनीतिक चेतना बहुत मुखर रूप में आयी है वरिष्ठ कवि मदन कश्यप का नाम उनमें प्रमुख है। राजनीति उनकी कविता का मुख्य स्वर है। इसलिए जिन कविताओं में वे बहुत मुखर होकर राजनीतिक चिंताओं को नहीं पकड़तें हैं वहां भी राजनीतिक दुष्परिणाम प्रकारान्तर से जरूर …

सौ वरियाँ दा जीवणा

पल्लव आत्मकथा की कसौटी क्या है? आत्मकथा कोई क्यों पढ़े? क्या उस सम्बंधित व्यक्ति के जीवन में ऐसा कुछ है जो पाठक को अपने लिए जानना आवश्यक लगता है इसलिए वह आत्मकथा पढ़े? आत्मकथा के मूल्यांकन में ये सभी सवाल खड़े होते हैं। और इनका कोई सर्वसम्मत जवाब नहीं खोजा जा सकता। जवाब कोई है …

वंचित समाज की कथा

विमल कुमार हिंदी साहित्य में इतिहास और पुराणों के आधार पर उपन्यास लिखना बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है, लेकिन उससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य यह है कि किसी रचना में उस दौर के इतिहास का इस्तेमाल करते हुए हैं उसमें एक नए पात्र और नये नायक का निर्माण करना जो इतिहास में वर्णित नहीं है …

एक आधे-अधूरे में पूरा अभिसार

लीलाधर मंडलोई “इतना भी कवि नहीं मैं कि तुझमें ढूंढूं अपनी प्रागैतिहासिक प्रेमिकाएं न इतना अंधविश्वासी कि बांधू तुझे किसी पिछले जन्म के उत्तरीय से मगर कुछ तो है कि स्वयं को देह और इतिहास के बाहर देखने लग जाता हूँ” (यक्षिणी पृ.18) हे कवि! यह चेतनावस्था के उदगार हैं न?   देह और इतिहास से …

जनता छाप इंटेलेक्चुअलता का लेखक

कथाकार मनोहर श्याम जोशी के जीवन पर आधारित प्रभात रंजन की पुस्तक ‘पालतू बोहेमियन’ काफी चर्चित रही है। प्रस्तुत है पुस्तक से एक रोचक अंश– प्रभात रंजन इंटेलेक्चुअलता अमृतलाल नागर का शब्द है। जोशी जी उनको अपना पहला कथा गुरु मानते थे। मुझे याद है कि शुरूआती मुलाकात में ही उन्होंने बताया था कि वे …

अंतरंगता के रंग

राकेश कुमार कलाएँ मानव सभ्यता की समृद्धि का पैमाना होती हैं और समय को जाँचने-परखने वाली आँख भी। अक्सर आलोचक-समीक्षक अपनी सुविधा की दृष्टि से कलाओं को चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, साहित्य आदि विभिन्न विधाओं और उपविधाओं में बाँट देते हैं, पर कला और साहित्य तो जीवन की भाँति सीमाओं और रूढ़ियों का अतिक्रमण करते हैं …

पुलित्जर पुरस्कार विजेताओं का ऐलान

कोरोना वायरस संकट के बीच इस साल के पुलित्जर पुरस्कार के विजेताओं की घोषणा हो गई। घोषणा के अनुसार, द न्यू यॉर्क टाइम्स ने सबसे अधिक तीन पुरस्कार जीते हैं। समाचार एजेंसी एएफपी के मुताबिक, ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’, ‘एंकरेज डेली न्यूज’, ‘प्रो पब्लिका’ को पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। पुलित्जर पुरस्कार सोमवार को उन …

सत्यान्वेषण की ईमानदार कार्यवाही उर्फ़ ‘आलोचना की पक्षधरता’

अंकित नरवाल ‘आलोचना को हर हाल में गलत बनाम सही, झूठ और अपर्याप्त सच बनाम सच का रूप ग्रहण करना ही चाहिए।’–विजयदेव नारायण साही हिन्दी आलोचना के इतिहास में किसी भी तरह की ‘पक्षधरता’ के सवालों को दरअसल पार्टीगत व दलगत समीकरणों के मार्फत ही समझने की परंपरा रही है। व्यापक अर्थों में उसे सत्यान्वेषण …

तुम एक किताब में कैद नहीं हो वॉन गॉग..!

सारंग उपाध्याय कला उम्‍मीदों का सवेरा है. कला के औजार ही मनुष्‍यता को निखारते हैं और उसकी आत्‍मा संवारते हैं. कला इतिहासकार आर्नल्‍ड हाउजर ने ठीक कहा है- ”कला उन्‍हीं की मदद करती है जो उससे मदद मांगते हैं, जो अपने विवेक के संशय, अपने संदेहों और अपने पूर्वग्रहों के साथ उसके पास आते हैं. …

ज़बरदस्त फ़ील गुड फ़ैक्टर है इन कहानियों में

प्रियदर्शी ठाकुर ‘ख़याल’ नंद भारद्वाज हिन्दी तथा राजस्थानी के सुविख्यात कवि एवं कथाकार हैं। उनकी कहानियों का नया संकलन “आपसदारी” अभी हाल ही में हासिल हुआ। मैं कोई नक़्क़ाद या समीक्षक नहीं; छोटी-मोटी शायरी, अनुवाद, ऐतिहासिक उपन्यास आदि में लगा रहता हूँ; नंद जी की इन कहानियों पर कुछ लिखूंगा यह तो ठीक से सोचा …

इस तहरीर का भेद अभी अंधकार में है

लीलाधर मंडलोई वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई का गद्य भी पढ़ने में काव्यात्मक लगता है। उनकी डायरी विशेष तौर पर पढ़ी जाती रही है। अब तक उनकी तीन डायरी प्रकाशित हैं- ‘दाना-पानी’, ‘दिनन दिनन के फेर’ और ‘राग सतपुड़ा’। शीघ्र ही चौथी डायरी प्रकाशित होने वाली है। ‘कोरोना काल’ में रची गयी डायरी के कुछ पन्ने …

जीवन का प्रमेय गढ़ते हुए’

मनोज पाण्डेय ‘प्रमेय’ जितेन्द्र श्रीवास्तव का प्रिय शब्द है। यह शब्द सिद्धि और साधना की अपेक्षा रखता है। जीवनानुभूति को काव्यानुभूति का विषय बनाती जितेन्द्र की काव्य-मनीषा उन प्रमेयों को सतत् गढ़ने की कोशिश करती जान पड़ती है जो अनछुए हैं, अनसुलझे या अनचिह्ने हैं— किन्हीं अर्थों में उपेक्षित और बहिष्कृत भी। उनकी कविताओं से …