महामारी में हत्या

शशिभूषण द्विवेदी कई बार कुछ किताबें भविष्यवाणी की तरह होती हैं। स्कॉटलैंड में जन्में और पले-बढ़े पीटर मे का ‘लॉकडाउन’ एक ऐसा ही उपन्यास है जो 2005 में बर्डफ्लू की महामारी के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया था। अब कोविड-19 महामारी के दौर में यह नए रूप में नए संदर्भों के साथ सामने आया है। पीटर …

अतिक्रमण से उत्पन्न समय-सत्यों का अन्वेषण

राकेश बिहारी इह शिष्टानुशिष्टानां शिष्टानामपि सर्वथा।  वाचामेव प्रसादेन लोकयात्रा प्रवर्तते॥ (इस संसार में शिष्टों अर्थात शब्दशास्त्रियों द्वारा अनुशासित शब्दों एवं उनसे भिन्न अननुशासित शब्दों की सहायता से ही सर्वथा लोक व्यवहार चलता है।) —आचार्य दण्डी उदारीकरण और भूमंडलीकरण के नाम पर नब्बे के दशक में जिन संरचनात्मक समायोजन वाले आर्थिक बदलावों की शुरुआत हुई थी, …

क्वायर का शोक गीत

वंदना राग हर चर्च में एक क्वायर होता है.लड़के-लड़कियों का, स्त्रियों और पुरुषों का, जो आस्थावान और बे- आस्था सबको अपने धीमे गायन से आध्यात्मिक दुनिया की ऐसी गलियों में लिए चलता है कि मन भीग जाता है। उपन्यास ‘अँधेरा कोना’ पढ़ते हुए एक ऐसा ही धीमा दुःख मन को जकड़ने लगता है और फिर …

हमारे समय में श्रम की गरिमा

पल्लव मैं एक आम हिंदुस्तानी हूँ। जैसा भारतीय मध्य वर्ग का परिवेश है मैं उसी में पला-बढ़ा। जब मैं दसवीं में पढता था, तब उसी साल प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने  मंडल आयोग की सिफारिशें मानकर आरक्षण की नयी व्यवस्था लागू करने की घोषणा की थी। इस पर तथाकथित सवर्ण तबके की तीखी प्रतिक्रिया हुई। मेरे शहर (चित्तौड़गढ़ ) …

ब्राह्मण से कश्मीरी पंडित तक का सफ़र [1320-1819]

अशोक कुमार पाण्डेय राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित अशोक कुमार पांडे की पुस्तक ‘कश्मीर और कश्मीरी पंडित’ काफी चर्चा में है। इसी किताब से एक अंश पुस्तकनामा के पाठकों के लिए — दसवीं सदी आते-आते कश्मीर में राजाओं के पतन से अराजकता का माहौल आम हो गया था। 883 ईसवी में अवन्तिवर्मन की मृत्यु के …

जो शामिल हैं इस दुनिया की तबाही में

विस्‍थापन, पीड़ा और दुश्‍चिंताओं की इबारत ओम निश्चल लीलाधर मंडलोई एक बेचैन कवि हैं। कुछ कवि होते हैं जिनके पास कहने को बहुत कुछ होता है और बार बार वे उस पीड़ा का इज़हार करते हैं जिससे यह पूरी मनुष्‍यता गुज़र रही है। कहने को हम विश्‍वबंधुता का ढोल अक्‍सर पीटते हैं पर पूरी दुनिया …

एक संकल्प यात्रा हिन्दी त्रैमासिक ‘शीतलवाणी’ की

शैलजा सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर से हिन्दी के फलक पर एक बड़ी इबारत लिखी जा रही है। इबारत लिखने का काम कर रही है सहारनपुर से प्रकाशित हिन्दी की एक साहित्यिक पत्रिका ‘शीतलवाणी’। इस साहित्यिक त्रैमासिक का सफ़र यूँ तो करीब 40 साल पुराना है लेकिन गत 12 वर्षों में …

मंज़िले-मकसूद

हाल ही में कथाकार तरुण भटनागर का उपन्यास ‘बेदावा’ राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित हुआ है। इन दिनों ‘बेदावा’ चर्चा में है। उपन्यास का एक बहुत ही रोचक अंश आपके लिए पुस्तकनामा पर… (सुधीर देख नहीं सकता। वह बचपन से अंधा है। एकदम नाबीना। पर खूबसूरत मोमबत्तियाँ बनाता है। अपर्णा उससे मोमबत्तियाँ बनाना सीखती है। …

समय समाज की निर्मम समीक्षा :वैधानिक गल्प

पंकज मित्र वैसे तो चंदन पाण्डेय के पहले उपन्यास ‘वैधानिक गल्प’ की अति सरलीकृत व्याख्या यह हो सकती है कि यह लव जिहाद और भीड़ हत्या के विषय पर लिखा गया है परंतु भीड़ को हत्यारी भीड़ में बदलने और इस कौशल से बदलने कि भीड़ को अहसास भी न हो कब वह कातिल  भीड़ …

…क्योंकि ‘कथा’ से आगे जहाँ और भी हैं

असीम अग्रवाल स्वयं प्रकाश प्रतिष्ठित कथाकार हैं, यह सबको पता है, लेकिन उन्होंने ‘कथा-साहित्य’ से भी अलग लिखा है। उनकी नयी पुस्तक ‘धूप में नंगे पाँव’ इसी तरह की कथेतर रचना है, तथा कथेतर साहित्य की दृष्टि से एक ज़रूरी प्रयास है। यह नहीं कहा जा रहा कि ‘कथा-साहित्य’ की ज़रूरत नहीं, बल्कि साहित्य में …

नींव के पत्थर नींव में ही समाते है

राजेंद्र शर्मा कल रात में सूचना मिली कि सहारनपुर के वरिष्ठ रंगकर्मी भाई वसी-उर-रहमान इस फ़ानी दुनिया से रूखसत हो गये हैं और देर शाम उन्हें गोटेशाह क़ब्रिस्तान में खाक-ए- सुपुर्द किया गया। इसे समय की विडम्बना ही कहा जाये कि जिन रंगकर्मी दोस्तों के साथ जीवन भर अभिनय करते रहे, सैट बनाते रहे, मंच …

कबीर के आहृवान की भूमिका

सुनील कुमार युवा कवि, कथाकार, आलोचक भरत प्रसाद की चुनी हुई कविताओं का संग्रह ‘पुकारता हूँ कबीर’ समाज के कई मुद्दों को आईना दिखाती हुई नजर आती है। अमन प्रकाशन से प्रकाशित इस काव्य संग्रह की प्रत्येक कविताओं में समाज से टकराहट की अनुगूँज सुनाई पड़ती है। महात्मा कबीर केवल संत कवि ही नहीं थें …

शैलेन्द्र : होठों पर सचाई और दिल में सफाई का अमर कवि, गीतकार

संजीव श्रीवास्तव सिनेमा में साहित्य से सीधा सरोकार रखने वाले लेखकों, कवियों की संख्या कभी कम नहीं रही। शैलेन्द्र ऐसे ही कवि, गीतकार थे जिनकी शख्सियत को आम सिनेमा प्रेमियों से लेकर सरोकारी साहित्यकारों के बीच भी प्रतिष्ठा हासिल थी। संभवत: शैलेन्द्र अकेले ऐसे गीतकार हुए जिनकी लेखनी पर नामधन्य साहित्यकारों ने भी काफी लिखा …

ठहरना भी किस तरह : अंतिम अरण्य

पूनम अरोड़ा कोई भी कृति नितांत रूप से एक व्यक्तिगत यात्रा होती है. एक ऐसी यात्रा जिसकी राह पर चलते-चलते हम अनजाने में ही कुछ छोटे कंकड़ (स्मृतियाँ) अपने सामान के साथ रख लेते हैं या कभी किसी ध्वनि के साथ अपने अतीत में खो जाते हैं. लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर वे स्मृतियाँ …