पुस्तकनामा

वह बोरिस पास्तरनाक और रिल्के से एक साथ प्रेम करती थी

विमल कुमार आपको जानकर शायद थोड़ा आश्चर्य लगे रूस की वह कवयित्री शादीशुदा होने के बाद भी अपने समय के दो बड़े लेखकों के साथ एक ही समय में प्रेम करती थी जबकि उसने प्रेम विवाह किया था। उससे पहले भी युवावस्था में भी उसके मन में एक पुरुष के लिए प्रेम अंकुरित हुआ था …

हिमयुगी चट्टाने : यहाँ से फ़िनलैंड को देखो

राकेश मिश्र प्रो. जी. गोपीनाथन की पहचान एक वरिष्ठ भाषा वैज्ञानिक, अनुवादक और नवोन्मेषी शिक्षाशास्त्री की रही है । महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के दूसरे कुलपति के रूप में उन्होंने भाषा प्रौद्योगिकी और अनुवाद प्रौद्योगिकी जैसे विषय शुरू कर हिन्दी भाषा के परंपागत अध्ययन-अध्यापन को जैसे एक नई उड़ान दी थी । एक अनुवादक …

क्योंकि निर्बंध जीना है उन्हें एक मनुष्य की तरह..!

सारंग उपाध्याय एक रचना अपने में संपूर्ण है. एक सृजन हर प्रतिक्रिया से परे. एक सुंदर फूल खिलने में पूर्ण है तो एक बहती नदी का सौंदर्य उसके होने में. स्वयं में पूर्ण. एक कविता संपूर्ण जीवन को लेकर अभिव्यक्त हुई. जीवन से भरा मन और भावों से भरा जीवन. जीवन किताबों में कहां?कविता जीवन …

जीवन, ज़मीन और जंगल की संघर्ष गाथा

अंकित नरवाल “आदिवासी सिर्फ बैंक है, जिसने जंगल में व्यापारियों के पैसा कमाने के लिए जंगल और जमीन की अमानत सँजो रखी है, नेताओं के वोट जुटा रखे हैं। आठ करोड़ आदिवासियों की हिमायत का दम भरने वाली सरकार को तो अब सिर्फ उद्योगपतियों का हित दिखता है। बड़े-बड़े कारखाने दिख रहे हैं। वह उदारवाद …

अपने समय का अंतर्पाठ करती ये कविताएं

उमा शंकर चौधरी हिन्दी कविता में जिन कवियों के यहां राजनीतिक चेतना बहुत मुखर रूप में आयी है वरिष्ठ कवि मदन कश्यप का नाम उनमें प्रमुख है। राजनीति उनकी कविता का मुख्य स्वर है। इसलिए जिन कविताओं में वे बहुत मुखर होकर राजनीतिक चिंताओं को नहीं पकड़तें हैं वहां भी राजनीतिक दुष्परिणाम प्रकारान्तर से जरूर …

वंचित समाज की कथा

विमल कुमार हिंदी साहित्य में इतिहास और पुराणों के आधार पर उपन्यास लिखना बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है, लेकिन उससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य यह है कि किसी रचना में उस दौर के इतिहास का इस्तेमाल करते हुए हैं उसमें एक नए पात्र और नये नायक का निर्माण करना जो इतिहास में वर्णित नहीं है …

जनता छाप इंटेलेक्चुअलता का लेखक

कथाकार मनोहर श्याम जोशी के जीवन पर आधारित प्रभात रंजन की पुस्तक ‘पालतू बोहेमियन’ काफी चर्चित रही है। प्रस्तुत है पुस्तक से एक रोचक अंश– प्रभात रंजन इंटेलेक्चुअलता अमृतलाल नागर का शब्द है। जोशी जी उनको अपना पहला कथा गुरु मानते थे। मुझे याद है कि शुरूआती मुलाकात में ही उन्होंने बताया था कि वे …

अंतरंगता के रंग

राकेश कुमार कलाएँ मानव सभ्यता की समृद्धि का पैमाना होती हैं और समय को जाँचने-परखने वाली आँख भी। अक्सर आलोचक-समीक्षक अपनी सुविधा की दृष्टि से कलाओं को चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, साहित्य आदि विभिन्न विधाओं और उपविधाओं में बाँट देते हैं, पर कला और साहित्य तो जीवन की भाँति सीमाओं और रूढ़ियों का अतिक्रमण करते हैं …

सत्यान्वेषण की ईमानदार कार्यवाही उर्फ़ ‘आलोचना की पक्षधरता’

अंकित नरवाल ‘आलोचना को हर हाल में गलत बनाम सही, झूठ और अपर्याप्त सच बनाम सच का रूप ग्रहण करना ही चाहिए।’–विजयदेव नारायण साही हिन्दी आलोचना के इतिहास में किसी भी तरह की ‘पक्षधरता’ के सवालों को दरअसल पार्टीगत व दलगत समीकरणों के मार्फत ही समझने की परंपरा रही है। व्यापक अर्थों में उसे सत्यान्वेषण …

इस तहरीर का भेद अभी अंधकार में है

लीलाधर मंडलोई वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई का गद्य भी पढ़ने में काव्यात्मक लगता है। उनकी डायरी विशेष तौर पर पढ़ी जाती रही है। अब तक उनकी तीन डायरी प्रकाशित हैं- ‘दाना-पानी’, ‘दिनन दिनन के फेर’ और ‘राग सतपुड़ा’। शीघ्र ही चौथी डायरी प्रकाशित होने वाली है। ‘कोरोना काल’ में रची गयी डायरी के कुछ पन्ने …

जीवन का प्रमेय गढ़ते हुए’

मनोज पाण्डेय ‘प्रमेय’ जितेन्द्र श्रीवास्तव का प्रिय शब्द है। यह शब्द सिद्धि और साधना की अपेक्षा रखता है। जीवनानुभूति को काव्यानुभूति का विषय बनाती जितेन्द्र की काव्य-मनीषा उन प्रमेयों को सतत् गढ़ने की कोशिश करती जान पड़ती है जो अनछुए हैं, अनसुलझे या अनचिह्ने हैं— किन्हीं अर्थों में उपेक्षित और बहिष्कृत भी। उनकी कविताओं से …

सांप्रदायिक दंगों के कारणों की पड़ताल करता है– ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था’

दीपक गिरकर हिंदी के सुपरिचित कथाकार पंकज सुबीर का धार्मिक दंगों की पृष्ठभूमि पर लिखा उपन्यास ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था’ इन दिनों काफी चर्चा में है। इस उपन्यास के पूर्व पंकज जी के दो उपन्यास और 5 कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इस उपन्यास में कथाकार ने धर्म, धार्मिक कट्टरता, सांप्रदायिक दंगों, विघटनकारी और …

देखना

अभिषेक कश्यप किस्से-कहानियों के साथ-साथ चित्रों से भी एक सहज लगाव बचपन से रहा है। तब शब्दों से इतना गहरा नाता नहीं बन पाया था लेकिन अब सोचता हूं, छुटपन में ही यह अहसास हो गया था कि अच्छे चित्रों में एक जादू होता है, जो हमारे अंतर्जगत में घटित होता है। अच्छे चित्र हमें …

भाषाई अस्मिता समाज को प्रभावित करती है

अनुपमा शर्मा हाल ही के वर्षों से रजा फाउंडेशन ने प्रसिद्ध चित्रकार एवं कलाकार सैयद हैदर रजा की कला एवं हिंदी साहित्य में रुचि एवं साहित्य-समाज के प्रति चिंताओं को ध्यान में रखते हुए, उन चिंताओं एवं विचारों को दिशा देते हुए हिंदी में कुछ नए किस्म की पुस्तकें प्रकाशित करने की पहल की है। …